कांग्रेस के लिए ‘स्लो प्वाइजन’ साबित हो रहे पीके

  • रीता के बीजेपी में जाने के बाद कांग्रेस में बड़े स्तर पर टूट की आशंका
  • कांग्रेस में पीके की चुनावी रणनीतियों से पार्टी का बड़ा तबका नाराज
  • यूपी में पीके का हर दांव पड़ रहा उल्टा

 प्रभात तिवारी
captureलखनऊ। खुद को ङ्क्षकग मेकर और चुनावी रणनीतिकार मानने वाले प्रशांत किशोर यानी पीके कांग्रेस के लिए स्लो प्वाइजन साबित हो रहे हैं। यूपी के आगामी चुनाव को ध्यान में रखकर बनाया गया पीके का हर दांव उल्टा पड़ रहा है। इन सबके बावजूद कांग्रेस में सब कुछ पीके के इशारों पर हो रहा है। इसलिए पार्टी का एक बड़ा तबका पीके से नाराज है। लंबे समय तक कांग्रेस की सेवा करने वाली रीता बहुगुणा जोशी का पार्टी से अलग होना इसका प्रमाण है। इसके साथ ही पीके पर कांग्रेस के नेताओं को राजनीति सिखाने और बोलने की आजादी पर रोक लगाने का आरोप भी पार्टी में चल रही अंदरखाने की राजनीति को स्पष्ट करता है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी के चुनावी रणनीतिकार रीता बहुगुणा जोशी के माध्यम से कांग्रेस का यूपी से सफाया करने की कोशिशों में जुट गये हैं। यदि बीजेपी कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को तोडऩे में सफल रही तो पीके पर करोड़ों रुपये खर्च करके यूपी में बहुमत की सरकार बनाने की उम्मीद लगाये बैठी कांग्रेस के लिए अपनी साख बचा पाना भी मुश्किल हो जायेगा।

हेमवती नंदन बहुगुणा की पुत्री और उत्तराखंड के पूर्व सीएम विजय बहुगुणा की बहन रीता बहुगुणा का कांग्रेस से काफी पुराना नाता रहा है। बहुगुणा परिवार ने लंबे समय तक पार्टी की सेवा की लेकिन कुछ महीने पहले विजय बहुगुणा ने कांग्रेस का साथ छोडक़र बीजेपी का दामन थाम लिया।

इसके बाद से ही रीता के बीजेपी में जाने की अटकलें तेज हो गई थीं लेकिन रीता ने सबको आश्वस्त कराया था कि वह कांग्रेस को छोडक़र नहीं जायेंगी। इसी बीच अचानक गुरुवार को रीता बहुगुणा जोशी का दिल्ली में भाजपा कार्यालय पर अमित शाह की मौजूदगी में बीजेपी में जाना कांग्रेस को बड़ा झटका माना जा रहा है। रीता ने बयान दिया कि पार्टी में वरिष्ठ नेताओं का बड़ा तबका राहुल का नेतृत्व स्वीकारने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह राहुल की तरफ से दिए जाने वाले उल्टे-सीधे बयान और खासकर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सेना के खून की दलाली वाले बयान के बाद काफी लोग आहत हैं। इसके अलावा पार्टी में पीके की यूपी में चुनाव जिताने के नाम पर की जा रही ज्यादतियों से भी लोग परेशान हैं। मतलब साफ है कि कांग्रेस में अंदरखाने भयंकर टूट होने की आशंका है। रीता बहुगुणा जोशी ने राहुल और प्रशांत के खिलाफ बोलकर इस असंतुष्ट तबके के लोगों को रास्ता दिखा दिया है। इसलिए बहुत जल्द बड़े स्तर पर लोगों के कांग्रेस से अलग होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। पार्टी सूत्रों की मानें, तो ऐसे लोगों की संख्या 50 के करीब है। यदि ऐसा हुआ, तो कांग्रेस पूरी तरह बिखर जायेगी, तब उसे संभाल पाना पीके और राहुल दोनों के लिए मुश्किल होगा।

कांग्रेस की डूबती नैया बचाने का कांट्रैक्ट

कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस की साख बचाने का कांट्रैक्ट प्रशांत किशोर को दिया है। इसके बदले में पीके ने कांग्रेस से करोड़ों रुपये भी लिए हैं। इतना ही नहीं पीके ने अपनी शर्तों के अनुसार काम करने की रजामंदी भी हासिल की है। इसलिए कांग्रेस में सब कुछ पीके की रणनीति के अनुसार ही हो रहा है। यूपी में गुलाम नबी आजाद को प्रदेश प्रभारी बनाने, शीला दीक्षित को सीएम उम्मीदवार घोषित करने और राजबब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का फैसला भी पीके की रणनीति का हिस्सा था। इसमें मुस्लिम वोटर्स को लुभाने के लिए जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद को प्रदेश प्रभारी बनाया गया। इसी तरह दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पार्टी की तरफ से सीएम उम्मीदवार घोषित कर ब्राह्मण वोटर्स को लुभाने की कोशिश की जा रही है। शीला का उन्नाव कनेक्शन भुनाने में भी जुटे हैं। इसी प्रकार सपा छोडक़र कांग्रेस में आने वाले राजबब्बर को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। चूंकि वह 2009 के चुनाव में अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव को हरा चुके हैं। इसके अलावा फिल्म अभिनेता भी हैं। इसलिए कांग्रेस ने राजबब्बर के माध्मय से सेलिब्रिटिज को पसंद करने वाले और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले नेता को प्रदेश की कमान सौंपी।

लेकिन तीनों दांव उल्टे पड़ते नजर आ रहे हैं।

पार्टी में असंतुष्ट लोगों का मानना है कि गुलाम नबी आजाद और शीला दीक्षित दोनों लोगों को यूपी की राजनीति, यहां के जातिगत समीकरणों और जनता की समस्याओं की जानकारी नहीं है। इसलिए वह यूपी में कांग्रेस को उबार पायेंगे, यह मुश्किल लग रहा है। इतना ही नहीं गुलाम नबी आजाद और शीला का यूपी और खासकर लखनऊ आना-जाना भी कम है। इसलिए भी पार्टी नेता उन्हें पसंद नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा यूपी में शीला दीक्षित का मुकाबला सत्ताधारी पार्टी के युवा नेता अखिलेश यादव से है। जो युवाओं में काफी पॉपुलर हैं। चूंकि यूपी में सबसे अधिक युवा वोटर हैं, इसलिए कांग्रेस का शीला को सीएम उम्मीदवार बनाने का फैसला सही नहीं माना जा रहा है। इसी तरह राजबब्बर सपा को छोडक़र कांग्रेस में शामिल हुए हैं। इसलिए पार्टी के अधिकांश नेता दलबदलू को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपने से काफी नाराज हैं। इन वजहों से पार्टी में अंदरखाने प्रशान्त किशोर के तीनों निर्णयों का जोरदार विरोध हो रहा है। पार्टी का कोई भी वरिष्ठ नेता यह स्वीकार नहीं करेगा कि उसे प्रशांत किशोर जैसा नान पॉलिटिकल व्यक्ति राजनीति का ककहरा सिखाए। इतना ही नहीं, उस नेता को कब, कहां और क्या बोलना है, इस बात की परमिशन भी प्रशांत किशोर से ले। इसके अलावा कांग्रेस की तरफ से निकाली जाने वाली रैलियों में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का दूरी बनाये रखना, खाट सभा में भगदड़ और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दे पर राहुल गांधी समेत कांग्रेस के अन्य नेताओं का खून की दलाली समेत अन्य विवादित बयान कांग्रेस के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। पार्टी के लोग कहने लगे हैं कि कांग्रेस को खबरों में बनाये रखने की चाहत में उल्टी-सीधी योजनाओं को लागू करवाना नुकसानदायक है। इससे अन्य पार्टियों को ही लाभ मिलेगा।

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