कश्मीर में पत्थरबाजी और आतंकवाद पर नोटबंदी का असर नहीं

सरकार लाख दावा करती रहे पर सच्चाई यह है कि कश्मीर में पत्थरबाजी पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ा है। आंकड़ें बयां करते हैं कि नोटबंदी के बाद भी कश्मीर में पत्थरबाजी रूकी नहीं है। कश्मीर में हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद आरंभ हुआ पत्थरबाजी का क्रम नोटबंदी से पहले ही ढलान पर आ गया था। केंद्र सरकार के दावों के बावजूद यह एक कड़वी सच्चाई है कि नोटबंदी के कारण कश्मीर के आतंकवाद पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है। कारण पिछले कुछ सालों से कश्मीर के आतंकवाद को होने वाली फंडिंग असली भारतीय करेंसी से हो रही है न कि नकली नोटों से। हालांकि नोटबंदी के बाद यह उम्मीद की गई थी कि कश्मीर में आतंकवादियों की कमर टूटेगी और पत्थरबाजों पर नकेल कसेगी। पर ऐसा हुआ नहीं। जो हुआ वह बहुत दर्द भरा है। राज्य की अर्थव्यवस्था कश्मीर के टूरिज्म और वैष्णो देवी की यात्रा पर आने वालों पर टिकी थी। आंकड़ों के मुताबिक, 8 नवम्बर की रात को नोटबंदी की घोषणा के बाद कश्मीर में समाचार भिजवाए जाने तक 15 घटनाएं पत्थरबाजी की हो चुकी थीं। इनमें से 10 घटनाएं कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में सिर्फ रविवार को हुई थीं। कश्मीर में एक नवम्बर से 14 नवम्बर तक पत्थरबाजी की कुल 49 घटनाएं हुई थीं। इनमें से यदि नोटबंदी के बाद वाली 15 घटनाएं निकाल दी जाएं तो इस माह के पहले 8 दिनों में पत्थरबाजी की 34 घटनाएं हुईं।
पत्थरबाजी की घटनाओं में आने वाली कमी को सरकारी तौर पर नोटबंदी से जोड़ा जा रहा है। पर यह सच्चाई नहीं है। अगर पत्थरबाजी की घटनाओं के आंकड़ों पर एक नजर डालें तो यह साफ होता है कि 8 जुलाई को बुरहान वानी की मौत के बाद पत्थरबाजी की घटनाओं में अचानक आया उछाल अगले दिनों में कम होता गया था। जुलाई 2016 में मात्र 21 दिनों में पत्थरबाजी की 820 घटनाएं हुईं। अगस्त में यह आकंड़ा 747 था पर अगले दो महीनों में इनकी संख्या और नीचे आ गई थी। सितम्बर में पत्थरबाजी की 157 घटनाएं हुईं और अक्तूबर में पत्थरबाजी की 119 घटनाएं हुईं। दरअसल, राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार के प्रयासों और सुरक्षा बलों की सख्ती के बाद इन घटनाओं में कमी आनी आरंभ हो गई थी जो 83 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। और इसमें नोटबंदी से पहले ही दिनों दिन और कमी आने लगी थी। नवम्बर में पहले 14 दिनों में पत्थरबाजी का आंकड़ा 49 रह गया था। और इसी कमी को अब नोटबंदी के साथ जोड़ कर सबको गुमराह करने की कोशिश की जा रही है जिस पर पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ऐतराज जताया है। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर के युवकों पर यह आरोप लगाना गलत है कि वे 500-1000 रुपयों के नोटों के लिए पत्थर मारते रहे हैं। अधिकारी भी यह बात स्वीकार करते हैं जो पिछले कई सालों से कश्मीर में फैले आतंकवाद के नाश के लिए जुटे हुए हैं और आतंकवाद को होने वाली फंडिंग पर कई सालों से नजर भी रखे हुए हैं। फिलहाल कई सालों से ऐसी फंडिंग का रैकेट तोडऩे में ये अधिकारी नाकाम रहे हैं। एक अधिकारी के बकौल, जबसे हवाला चैनलों की नकेल कसी गई है अलगाववादियों को मिलने वाला धन असली भारतीय करेंसी में लीगल तरीके से छोटी-छोटी रकमों के रूप में मुहैया करवाया जा रहा है जिन्हें तलाश कर पाना आसान नहीं है। कश्मीर में आतंकवाद पर नजर रखने वाले एक पुलिस अधिकारी का कहना था कि ऐसे में जबकि कश्मीर के आतंकवाद में अब स्थानीय युवकों की भूमिका सीमित होती जा रही है तो आतंकवाद की फंडिंग के लिए नगदी का प्रवाह उतना नहीं रह गया है जो एक दशक पहले हुआ करता था। हालांकि कुछेक अलगाववादी नेताओं के पास नगदी कुछ चैनलों से पहुंचाई जाती रही है वे नोटबंदी के कारण थोड़ा परेशान जरूर हैं। पर वे जानते हैं कि उनके पास जो नगदी है वह असली नोटों के रूप में है जिस कारण वे उसे बदलवाने की जुगत में जुट गए हैं। एक दशक पहले तक कश्मीर के आतंकवाद की फंडिंग नकली नोटों से हुआ करती थी लेकिन कुछ साल पहले सईद अली शाह गिलानी के खास गुलाम मुहम्मद बट को नकली नोटों की बहुत बड़ी खेप के साथ पकड़ा जाने के बाद अलगाववादियों को मिलने वाली नगदी का प्रारूप और रास्ता पूरी तरह बदल गया था। हालांकि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी उम्मीद करते हैं कि नोटबंदी के बाद कश्मीर में आतंकवाद को होने वाली फंडिंग में कमी आएगी पर वे भी आशंकित इसलिए थे क्योंकि वे भी जानते थे कि अलगाववादियों और आतंकियों को मिलने वाली नगदी का प्रवाह कानूनी तरीकों से होने के कारण उन्हें अलगाववादियों पर कानूनी शिकंजा कसने में दिक्कत होती है। लेकिन नोटबंदी का नतीजा यह हुआ कि कश्मीर की ओर रूख करने वाले टूरिस्टों ने मुख मोड़ लिया और वैष्णाो देवी आने वालों की संख्या में 40 फीसदी की कमी आ गई। यही नहीं वैष्णो देवी में चढ़ावे में 50 प्रतिशत की कमी आ गई और कट?ा व जम्मू में खरीददारी न के बराबर ही पहुंच चुकी है।

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