कब तक जिंदा जलते रहेंगे मेहनतकश

किसी फैक्ट्री में आग की चपेट में आकर मजदूरों की मौत का यह पहला वाकया नहीं है। ऐसे तमाम हादसों में हजारों की संख्या में मजदूर अपनी जान गवां चुके हैं। सवाल यह है कि इन मजदूरों के मौत का जिम्मेदार कौन है? क्या फैक्ट्री संचालक को केवल इसका जिम्मेदार माना जाए? क्या सरकारी तंत्र इसके लिए जिम्मेदार नहीं है?

sanjay sharma editor5उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद स्थित जैकेट फैक्ट्री में भीषण आग लगने से 13 मजदूर जिंदा जल गए। कई झुलस गए हैं। वे जीवन और मौत के बीच झूल रहे हैं। इस घटना के ठीक एक दिन पहले प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐशबाग स्थित एक परफ्यूम गोदाम में आग लगने से छह मजदूर झुलस गए थे। किसी फैक्ट्री में आग की चपेट में आकर मजदूरों की मौत का यह पहला वाकया नहीं है। ऐसे तमाम हादसों में हजारों की संख्या में मजदूर अपनी जान गवां चुके हैं। सवाल यह है कि इन मजदूरों के मौत का जिम्मेदार कौन है? क्या फैक्ट्री संचालक को केवल इसका जिम्मेदार माना जाए? क्या सरकारी तंत्र इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या मजदूरों के हितों की रक्षा करने और उसके जान की हिफाजत करने की जिम्मेदारी से सरकार मुंह मोड़ सकती है? साहिबाबाद की ताजा घटना ने सरकारी तंत्र की लापरवाही उजागर कर दी है। अधिकारी भी मान रहे हैं कि यह फैक्ट्री अवैध रूप से संचालित थी। सवाल यह है कि यदि फैक्ट्री अवैध थी तो इसके लिए जरूरी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जब हादसा हो गया है तब संचालक से पूछताछ की जा रही है और फैक्ट्री को सील किया गया है। यदि सरकारी तंत्र पहले कार्रवाई करता तो मजदूरों की जान जाने से बच सकती थी। दरअसल, फैक्ट्री को बिना निर्धारित मानक पूरे किए बिना हरी झंडी दे दी जाती है। अधिकारी व संचालक मिलीभगत कर कमाई में जुटे हैं। वहीं, सियासतदां ऐसे मौकों पर शोक संदेश जारी कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं और स्थिति जस की तस बनी रहती है। देश में मजदूरों के हितों के लिए कई कानून बनाए गए लेकिन उनको अमलीजामा पहनाने के लिए बना तंत्र कभी सक्रिय नहीं दिखा। लिहाजा देश भर में अवैध फैक्टियों की भरमार हो गई। सबसे खराब स्थिति उन मजदूरों की है जो दिहाड़ी पर काम करते हैं और असंगठित क्षेत्र से संबंधित हैं। अधिकांश फैक्ट्रियों में मजदूर विपरीत स्थितियों में जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं, जहां उन्हें न केवल कम मजदूरी में अधिकतम काम कराया जाता है बल्कि उनको बीमा, पीएफ आदि की सुविधा तक नहीं दी जाती है। ऐसी फैक्ट्रियों में न तो आग पर नियंत्रण के लिए कोई फौरी व्यवस्था होती है न मजदूरों के जान की हिफाजत का कोई तंत्र होता है। सरकार को चाहिए कि वह मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए न केवल आगे आए बल्कि कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करे। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की तरक्की इन मेहनतकशों की मेहनत का परिणाम है।

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