एड्स के खूनी शिकंजे में राजधानी, हजारों संक्रमित

  • एचआईवी संक्रमित मरीजों की संख्या में हर साल हो रहा तेजी से इजाफा
  • सरकार की ओर से चलाया जा रहा जन जागरूकता अभियान बेअसर

वीरेन्द्र पांडेय
captureलखनऊ। देश भर में एचआईवी संक्रमित रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस बीमारी पर रोकथाम के लिए लोगों को जागरूक करने के नाम पर सरकार की तरफ से सालाना खर्च हो रहे करोड़ों रुपये का रिजल्ट सिफर रहा है। एचआईवी संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यूपी की राजधानी लखनऊ में ही एचआईवी संक्रमित रोगियों की संख्या 12 हजार 650 हो गई है। ये आंकड़ा उन मरीजों का है, जिनका पंजीकरण केजीएमयू और लोहिया समेत अन्य एआरटी सेंटर्स में कराया गया है, जबकि एचआईवी से पीडि़त बहुत से लोग अस्पताल जाने और अपनी बीमारी के बारे में बताने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते हैं। ऐसे लोग अपने साथ-साथ परिवार के लोगों में भी संक्रमण का खतरा उत्पन्न करते हैं, जो बहुत ही खतरनाक साबित हो रहा है।
एचआईवी संक्रमित रोगियों की संख्या उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ रही है। राजधानी के केजीएमयू स्थित एआरटी सेन्टर में 12000 मरीज रजिस्टर्ड हैं। वहीं इस वर्ष अब तक 400 नये मरीज यहां पर इलाज के लिए आ चुके हैं, जिनका पंजीकरण कर इलाज मुहैया कराया जा रहा है। इसके अलावा डॉ. राम मनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय में स्थित एआरटी सेन्टर में एचआईवी संक्रमित 650 लोगों का पंजीकरण हुआ है। लोहिया में इस साल अब तक एचआईवी संक्रमित 98 नये मरीज आ चुके हैं। यहां पर बीते वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च के बीच 124 नये मरीज संक्रमण के चलते पहुंचे थे।

ओपीडी में रोजाना आते हैं 100 मरीज

केजीएमयू स्थित एआरटी सेन्टर पर तैनात चिकित्सक डॉ. नीतू गुप्ता बताती हैं कि एआरटी सेंटर में रोजाना 100 एचआईवी संक्रमित मरीजों की ओपीडी होती है। प्रत्येक महीने लगभग 40 से 50 नये लोग एचआईवी संक्रमण के साथ पहुंचते हैं। उन्होंने बताया कि 2014 के बाद से यहां पर एचआईवी संक्रमित लोग पहले की अपेक्षा कम आते हैं, इसका प्रमुख कारण दूसरे जनपदों के जिला अस्पतालों में एआरटी सेन्टर का खुलना है। जहां जाकर लोग चिकित्सक से उचित परामर्श और इलाज करवा रहे हैं।
पड़ोसी जिलों में जाने वाले अधिकांश पेशेंट ऐसे होते हैं, जिन्हें अपनी बीमारी को लेकर संदेह होता है और बीमारी के बारे में किसी को बताना नहीं चाहते हैं। डॉ. गुप्ता ने बताया कि इस संक्रमण के इलाज से बेहतर है कि इसके बचाव के कारगर उपायों को अपनाया जाय। जनता में तमाम तरह की भ्रांतियां हैं, उन्हें दूर किया जाना चाहिए। यदि लोगों को बीमारी के बारे में सही जानकारी होगी, तो संक्रमित व्यक्ति की वजह से अन्य व्यक्तियों को होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

विन्डो पीरियड है सबसे खतरनाक

डॉ. नीतू के मुताबिक संक्रमण के बाद तीन सप्ताह से लेकर 6 महीने तक एचआईवी खून की जांच में निगेटिव भी आ सकता है। इस दौरान संक्रमित व्यक्ति के अन्दर भी संक्रमण का पता नहीं चल पाता, यह बेहद खतरनाक होता है। जब व्यक्ति के अन्दर नया-नया संक्रमण होता है, तो उसके अन्दर वायरस ज्यादा एक्टिव होते हैं। ऐसे में उसके सम्पर्क में आना तथा उसके द्वारा किए गए रक्तदान से संक्रमण दूसरों में फैल सकता है। इसका एक ही तरीका है कि किसी प्रकार से संक्रमण का शक होने पर रक्त की विशेष जांच के द्वारा 3 सप्ताह से लेकर 6 महीने के बीच भी एचआईवी संक्रमण का सही पता लगाया जा सकता है। इस वजह से और लोगों को संक्रमण से बचाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि एआरटी सेन्टर पर आने वाले एचआईवी संक्रमित लोगों में से 90 प्रतिशत लोगों में इस संक्रमण का प्रमुख कारण असुरक्षित यौन संबन्ध ही रहा है। बाकी बचे 10 प्रतिशत एचआईवी संक्रमित लोगों में संक्रमण फैलने का कारण संक्रमित रक्त अथवा अन्य कारण होते हैं।

चिकित्सा विभाग की लापरवाही उजागर

एचआईवी संक्रमण को लेकर आज भी स्वास्थ्य महकमा सजग नहीं है, जिसकी वजह से चिकित्सकों, पैरामेडिकल स्टाफ तथा आम जनता पर संक्रमण की तलवार लटकती रहती है। किसी भी मरीज का इलाज सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखे बिना शुरू कर दिया जाता है। जानकारों की माने तो सरकारी अस्पतालों में खून की जांच से लेकर जख्म साफ करने तक में दस्तानों का प्रयोग कम ही होता है। विशेषकर ट्रामा के मरीजों का इलाज करते समय सावधानी का न बरतना बेहद लापरवाहीपूर्ण रवैया है। इससे स्वास्थ्यकर्मियों के साथ अन्य मरीजों की जान भी आफत में डाल देता है। इस मामले में बीते अगस्त माह में दिनेश कुमार नाम के व्यक्ति ने स्वास्थ्य मंत्री से लोहिया अस्पताल की इमरजेन्सी में लापरवाही से इलाज करने की शिकायत की थी। उस शिकायत में कहा गया था कि एचआईवी से संक्रमित एक मरीज का एक्सीजेंट के बाद असावधानीपूर्वक ा इलाज किया गया। चिकित्सकों ने न तो दस्ताने का उपयोग किया गया और न ही कर्मचारियों ने अपने हाथ धुले। चिकित्सकों ने उसी हाथ से दूसरे मरीजों को इंजेक्शन लगाया और अन्य मरीजों के अंगों की जांच की। ऐसी हरकतें सरकारी अस्पतालों में होना आम हैं। वहीं केजीएमयू के एआरटी सेन्टर पर काम करने वाली एनजीओ की एक महिला कर्मचारी ने एचआईवी संक्रमित गर्भवती महिलाओं के प्रसव और खून की जांच में लापरवाही बरते जाने की शिकायत की है। यहां भी दस्ताने का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इससे संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। जो बेहद खतरनाक है।

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