आतंकी फरमानों की परवाह नहीं सेना भर्ती में उमड़ रहे युवक

आतंकी धमकी अलगाववादियों की चेतावनी और कश्मीर बार एसोसिएशन की सलाह के बावजूद फौज में भर्ती के लिए उमड़ी भीड़ कश्मीर की तस्वीर पलट रही है। रोजगार के साधन के रूप में फौज में भर्ती होने की ख्वाहिश लिए कश्मीर में आने वालों में इस बार वे कश्मीरी पंडित भी थे जो अभी तक फौज में भर्ती होना जिन्दगी बर्बाद करना समझते रहे हैं। सेना द्वारा जम्मू कश्मीर के विभिन्न भागों में सैनिकों की भर्ती के लिए कार्यक्रम घोषित करते ही आतंकवादी छटपटा उठे थे। नतीजतन पहले हिज्बुल मुजाहिदीन ने फौज में जाने के इच्छुक कश्मीरियों को डराना आरंभ किया तो फिर लश्करे तौयबा, जैश-ए-मुहम्मद और यूनाईटेड जेहाद काउंसिल भी सामने आ गई। उनका साथ देने हुर्रियती नेताओं और बार एसोसिएशन ने भी मोर्चा खोल दिया।

पर यह सब उन कश्मीरी युवकों के कदमों को नहीं रोक पाए जिनके सामने बेरोजगारी से निपटने के दो रास्तों में से एक को चुनना था। या तो वे आतंकवाद की राह पर चल पड़ते या नौकरी के लिए उपलब्ध साधनों को ही थामने का प्रयास करते ऐसा सैनिक प्रवक्ता का कहना था। उनकी जानकारी के मुताबिक, कुछ दिन पहले कुपवाड़ा के लंगेट में एकत्र हुई दस हजार की भीड़ को नियंत्रित कर पाना आसान काम नहीं था। तो जम्मू के संजवां में हुई भर्ती में 30 हजार की भीड़ आतंकियों के मुंह पर थप्पड़ के समान थी।
यूं तो कश्मीर से सबसे खतरनाक माने जाने वाले स्थानीय आतंकी गुट हिज्बुल मुजाहिदीन ने भारतीय सेना में स्थानीय युवकों की भर्ती पर रोक लगा दी थी। साथ ही भारतीय सेना में भर्ती होने वाले युवकों से कहा था कि ऐसा करने वाले कौम के दुश्मन होंगे जिनसे बतौर दुश्मन ही निपटा जाएगा। पर इन धमकियों का कोई असर अब नहीं दिख रहा है। यह एकत्र होने वाली भीड़ स्पष्ट करने लगी है।
पिछले कुछ समय से जम्मू कश्मीर के विभिन्न इलाकों में भर्ती अभियान चल रहे हैं। जहां भी भर्ती अभियान होता है वहां चारों ओर भीड़ का अथाह समुद्र नजर आता है। सेना इससे खुश है। आज से पहले कश्मीर में फौज में भर्ती होने के लिए इतने लोग कभी सामने नहीं आए थे। कारण वही थे कि लोगों को अपनी जान का खतरा था और वैसे भी आतंकवादी कई बार लोगों को फौज में भर्ती होने के प्रयासों के लिए सजाएं दे चुके थे।
खतरा और डर इस बार भी है। इसमें कोई कमी नहीं आई है। अंतर अगर आया है तो पेट पालने की मजूबरी के प्रति सोच का है। आम कश्मीरी अब समझने लगा है कि अगर वह आतंकी धमकियों के आगे यूं ही झुकता रहा तो उसके भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। पहले ही रोजगार के साधन नहीं मिल पा रहे और फौज में भर्ती होकर सम्मानजनक जिन्दगी जीने का जो मौका मिला है वे उसे गंवाना नहीं चाहते। दूसरे शब्दों में कहें तो बेरोजगारी का दंश आतंकवादी धमकी और चेतावनी पर भारी पड़ रहा है।
आम कश्मीरी का मानना है कि आतंकवादी उन्हें सम्मानजनक जिन्दगी और रोजगार तो दे नहीं रहे जिस कारण उनकी बात को माना जाए। नतीजतन आने वाले दिनों में भी कश्मीर में होने जा रही फौज की भर्तियों में इसी प्रकार की भीड़ दिखाई देने की उम्मीद सेना को है। हालांकि ताजा भर्ती अभियान कुछ दिनों तक जारी रहेगा। वैसे पिछली बार के भर्ती अभियान का एक खास पहलू यह भी था कि इसमें शामिल होने के लिए कश्मीरी पंडित समुदाय के 40 नौजवान भी विशेष तौर पर कश्मीर घाटी गए थे। अभी तक कश्मीरी पंडित समुदाय की नजर में फौज की नौकरी सबसे बेकार होती थी। मगर अब ऐसा नहीं है। रोजगार के घटते साधनों के सामने फौज की भी नौकरी अब सभी को सम्मानजनक लगने लगी है और यह सम्मान आतंकी धमकी को नकार कर पाया जाए तो बात ही कुछ और होती है।
आतंकी चेतावनी पहले स्थानीय अखबारों में विज्ञापन देकर दी गई थी फिर हिज्बुल मुजाहिदीन की ओर से इस आश्य के कई धमकी और चेतावनी भरे पोस्टर नियंत्रण रेखा से सटे पुंछ, राजौरी तथा उधमपुर के आतंकवादग्रस्त क्षेत्रों में चिपकाए गए थे। इस पोस्टरों में क्षेत्रों के युवकों को खबरदार किया गया था कि वे सेना के किसी भी भर्ती अभियान में शामिल न हों। साथ में ऐसा करने वाले युवकों को परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी गई है।
हालांकि बाद में इन उर्दू में लिखे गए पोस्टरों को सुरक्षा बलों की सहायता के साथ पुलिस ने उखाड़ दिया था लेकिन पोस्टरों को हटाने से पहले ही वे अपना कुछ प्रभाव छोडऩे में कामयाब हुए थे। सेना इन क्षेत्रों में प्रादेशिक सेना में स्थानीय युवकों को भर्ती करने का अभियान छेड़े हुए थी और इन क्षेत्रों में ये भर्ती अभियान कुछ ढीले पड़ गए थे। लेकिन यह सच्चाई है कि कश्मीर में ये आतंकी फरमान अब कोई मायने नहीं रखते क्योंकि असल में बेरोजगारी के चलते आतंकवादग्रस्त क्षेत्रों में बेरोजगार युवकों के लिए नौकरियों का सहारा सेना ही है और प्रादेशिक सेना में भर्ती होने के लिए हजारों युवा आगे आ रहे हैं। फिलहाल कोई आधिकारिक रिकार्ड तो नहीं है कि कितने युवक पिछले दिनों सेना में भर्ती हुए लेकिन इतना जरूर है कि इन पोस्टरों के सामने आने के बाद भर्ती अभियान कुछ ढीला जरूर पड़ गया था जम्मू संभाग के इलाकों में।
सूत्रों के मुताबिक, बुद्धल इलाके में भी इस तरह के कई पोस्टर दिखाई दिए थे। इनमें आम लोगों को प्रादेशिक सेना के अतिरिक्त भारतीय सेना की किसी भी यूनिट में शामिल न होने के लिए कहा गया था तथा यह भी कहा गया था कि वे भारतीय सुरक्षा बलों से दूरी को बनाए रखें। इन पोस्टरों को हिज्बुल मुजाहिदीन के लोगों ने चिपकाया है जो इन क्षेत्रों में दबदबा रखते हैं।
हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों की ओर से ये पोस्टर कई स्थानों पर मस्जिदों की दीवारों पर भी चिपकाए हुए पाए गए। चटाना इलाके में इसके कई बंडल भी मिले जिससे यह शक पैदा होता था कि ऐसा करने वाले कुछ स्थानीय समर्थक होंगे जो पोस्टरों को इस तरह से छोड़ गए। इन पोस्टरों के द्वारा लोगों को जारी की गई अपनी धमकी में हिज्बुल मुजाहिदीन कहता था, जम्मू कश्मीर में जारी जेहाद में 95 हजार लोग मारे गए हैं। प्रादेशिक सेना में शामिल मत होईए क्योंकि सेना भी खून खराबा कर रही है।
पोस्टर में दी गई चेतावनियों तथा धमकियों में आगे कहा गया था कि जो लोग सुरक्षा बलों के लिए काम कर रहे हैं वे मुखबरी करना छोड़ दें वरना इसके गंभीर परिणाम उन्हें तथा उनके परिवारों को भुगतने पड़ सकते हैं। इन पोस्टरों में कहा गया है कि सुरक्षा बल मासूम लोगों पर स्वयं हथगोले दागते हैं और झूठा इल्जाम जेहादियों पर मढ़ देते हैं। इतना जरूर है कि पोस्टरों में जो धमकियां दी गई हैं उसके साथ ही लोगों से यह भी कहा गया है कि वे केबल टीवी देखना बंद कर दें तथा शराब पीना भी त्याग दें।
स्थिति यह है कि इतनी मात्रा में ऐसे धमकी भरे पोस्टरों ने लोगों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया था। हालांकि सुरक्षाधिकारी लोगों को सुरक्षा का आश्वासन तो दे रहे हैं मगर वे सुरक्षा बलों की बातों पर इसलिए विश्वास नहीं कर पा रहे क्योंकि पहले भी ऐसे आश्वासन कभी सच साबित नहीं हुए थे। पर कश्मीर के विभिन्न भागों में चल रहे भर्ती अभियानों में उमड़ी भीड़ सबसे अधिक आतंकवादियों को परेशान कर रही थी। अब उन्हें सच्चाई का पता चल गया था कि कश्मीर में आम नागरिकों पर उनके फरमान बेरोजगारी के आगे कमजोर पड़ते जा रहे हैं। वैसे यह पाकिस्तान की चिंता का भी कारण बन गए हैं क्योंकि वह जान गया है कि धमकी और चेतावनी के बल पर कश्मीर की जनता को तथाकथित जेहाद में शामिल कर पाना अब आसान कार्य नहीं है।

खतरा और डर इस बार भी है। इसमें कोई कमी नहीं आई है। अंतर अगर आया है तो पेट पालने की मजूबरी के प्रति सोच का है। आम कश्मीरी अब समझने लगा है कि अगर वह आतंकी धमकियों के आगे यूं ही झुकता रहा तो उसके भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। पहले ही रोजगार के साधन नहीं मिल पा रहे और फौज में भर्ती होकर सम्मानजनक जिन्दगी जीने का जो मौका मिला है वे उसे गंवाना नहीं चाहते।

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