आतंकवाद, मुठभेड़ और सियासत

सवाल यह है कि क्या कई दशकों से आतंकवाद का दंश झेल रहे इस देश के राजनीतिक दलों को ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर सवाल नहीं उठाना चाहिए? क्या विपक्ष खास समुदाय के वोट बैंक को भुनाने के लिए ऐसा कर रहा है या यह सरकार को घेरने और उसकी विफलता को जनता के सामने पेश करने की उनकी रणनीति है? सवाल यह भी है कि खुफिया सूचना के बाद भी जेल के अंदर और बाहर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए गए और क्या इसके पीछे घर के किसी भेदी का हाथ है?

sanjay sharma editor5दीपावली की रात भोपाल की सेंट्रल जेल में सिमी के आठ आतंकवादियों ने पहले एक हेडकांस्टेबल की हत्या की फिर चादर के सहारे दीवार फांदकर फरार हो गए। हालांकि चंद घंटों के भीतर पुलिस ने न केवल इनको खोज निकाला बल्कि मुठभेड़ में मार भी गिराया। लेकिन इसके बाद जारी वीडियो और पुलिस एवं राज्य के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह के विरोधाभासी बयानों ने मामले को उलझा दिया। पुलिस जहां आतंकियों के पास हथियार होने की पुष्टिï कर रही है वहीं मंत्री महोदय इंकार कर रहे हैं। इसको लेकर विपक्षी दलों ने न केवल सरकार पर हमला बोल दिया है बल्कि भुठभेड़ को फर्जी करार दे दिया है। विपक्ष ने मामले की न्यायिक जांच की मांग भी की है। सवाल यह है कि क्या कई दशकों से आतंकवाद का दंश झेल रहे इस देश के राजनीतिक दलों को ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर सवाल नहीं उठाना चाहिए? क्या विपक्ष खास समुदाय के वोट बैंक को भुनाने के लिए ऐसा कर रहा है या यह सरकार को घेरने और उसकी विफलता को जनता के सामने पेश करने की उनकी रणनीति है? सवाल यह भी है कि खुफिया सूचना के बाद भी जेल के अंदर और बाहर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए गए और क्या इसके पीछे घर के किसी भेदी का हाथ है? यदि ये आतंकी फरार होने में सफल हो जाते तो किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते थे। दरअसल, विपक्ष ने वीडियो में दिख रहे दृश्य के आधार पर सवाल उठाए हैं। उसमें दिखाया गया है कि कुछ आतंकी समर्पण करना चाहते थे लेकिन उन्हें मार दिया गया। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव व बसपा प्रमुख मायावती समेत अधिकांश दलों ने मुठभेड़ के जांच की मांग की है। हकीकत यह है कि अधिकांश मामलों में जब आतंकी मुठभेड़ में मारे जाते हैं, सियासी दल गोटियां बिछाने लगते हैं। बाटला हाउस एनकाउंटर के समय ऐसा ही नजारा दिखा था। विपक्ष यह कैसे मान लेता है कि पकड़े जाने के बाद आतंकी फरार नहीं होंगे, जबकि जिनको मारा गया है कि उन पर पहले भी पुलिसकर्मियों की हत्या और जेल से फरार होने के केस दर्ज हैं। क्या वीडियो की सत्यता जांचे बगैर विपक्ष को ऐसे बयान देने चाहिए। विपक्ष को यह समझना चाहिए कि जिन वोटों के चक्कर में वे बयानबाजी करते हैं, उस समुदाय में आतंकवाद को लेकर किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं है। लिहाजा दांव उल्टा भी पड़ सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस जेल में खूंखार आतंकवादी बंद हों वहां खुफिया सूचना के बाद भी सुरक्षा की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। दूसरे इनको एक साथ एक ही जेल में क्यों रखा गया? ऐसे कैदियों को एक साथ रखने से षडय़ंत्र होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। इस बात का जवाब तो सरकार को देना ही होगा। साथ ही उसे यह भी बताना होगा कि वीडियो की सत्यता क्या है? यदि वीडियो सत्य है तो यह न केवल मानवाधिकार बल्कि भारतीय संविधान का उल्लंघन भी होगा, जिसमें विधि सम्मत ढंग को छोडक़र किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन से वंचित नहीं किया जा सकता।

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