आतंकवाद का विरोध करने से हुआ ट्रंप का उदय

 तरुण विजय

डोनाल्ड ट्रम्प की जीत ने अमेरिकी चुनाव में समीकरण ही बदल डाले इसके साथ ही सेकुलर पाखंड ओढ़े उन समीक्षकों की असलियत उजागर कर दी जो भारत से अमेरिकी चुनाव यों लड़वा रहे थे मानो विश्व को डोनाल्ड आपदा से बचाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर हो।
अमेरिकी नागरिकों ने अमेरिका के लिए जो व्यक्ति उन्हें सर्वश्रेष्ठ और प्रभावी लगा उसे चुना। विरोधी गंदे, कीचड़ और अभद्र व्यक्तिगत आक्षेपों के सहारे ट्रंप को दुनिया का सबके वीभत्स उम्मीदवार बता रहे थे। कुछ लोग विश्लेषण कर रहे हैं कि अमेरिकी नागरिक इतने असभ्य और बर्बर कैसे हो सकते हैं। अमेरिकी इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति पद के निकट पहुंची एक महिला को चुनने से इंकार कर दिया।
इसका उत्तर केवल यह है कि अमेरिकी नागरिक अमेरिका को सुरक्षित और समृद्ध बनाने वाला राष्ट्रपति चाहते थे न कि ऐसा व्यक्ति जो दो मुंहा हो जिसके लिए भ्रष्टाचार साधारण नगण्य विषय हो और वो अरब अतिवादियों से जुड़ी एक महिला को अपना प्रमुख सहयोगी बनाए हुए हो।
ट्रम्प ने तीखी कठोर भाषा में इस्लामी आतंकवादियों को समाप्त करने का वचन दिया तो भारत के सेकुलर परेशान हो गए और उन्हें लगा ट्रम्प विश्व युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन अमेरिकी मतदाताओं ने ट्रम्प की इस्लामी आतंकवाद विरोधी मुहिम को गंभीरता से लिया। ट्रम्प ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट और चीन की विस्तारवादी आक्रामकता के बारे में प्रखर अमेरिकी नेता के नाते हिम्मत और हौसले की वह बुलंदगी दिखायी जो अन्य विपक्षियों में नदारद थी। उस पर ट्रम्प की नीतियों से प्रसन्न रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन का जब समर्थन मिला तो अमेरिकी मतदाताओं को लगा कि ट्रम्प मध्य पूर्व तथा सीरिया के संकट को रूस के साथ मिलकर सुलझा सकते हैं। अफगानिस्तान में बिखराव रोक सकते हैं और विश्व में ओबामा की नीतियों से बढ़े तनाव एवं शीत युद्ध के बारे में बवंडर को थाम सकते हैं।
ट्रम्प ने अमेरिका में उन सभी समुदायों को अपने साथ लेने का प्रयास किया जो आतंकवाद के शिकार हुए और इनमें सबसे प्रमुख थे भारतीय मूल के अमेरिकी हिन्दू। बीस लाख से अधिक की जनसंख्या वाले अमेरिकी हिंदू व्यापार, साफ्टवेयर, सिलीकॉन वैली स्टार्ट-अप तथा चिकित्सकों के वर्ग में आज सबसे प्रभावी हैं। उनकी तुलना केवल इजारायली यहूदी समुदाय से की जा सकती है। केवल व्यापार में, संपदा निर्माण में अमेरिकी हिंदू दौ सौ अरब डालर का आंकड़ा पार कर गया है। सबसे धनी प्रभावशाली और उच्च शिक्षित अमेरिकी हिंदुओं ने ट्रम्प के लिए न्यू जर्सी में एक विशाल सभा का आयोजन किया जिसका मुख्य विषय था बांग्लादेश और भारतीय कश्मीर में इस्लामी आतंकवाद का शिकार हुए हिंदू परिवारों की सहायता के लिए धन जुटाना। ट्रम्प वहां तीन घंटा रहे। इस आयोजन का प्रारंभ एक सशक्त नाट्य से हुआ था जिसमें अरब आतंकी निर्दोष स्त्री-बच्चों को मार रहे हैं और अंतत: अमेरिकी सैनिक उन्हें परास्त कर राष्ट्र ध्वज लहराएं यह संदेश अमेरिकी ध्वज की शक्ति और गौरव को बचाने का था जिसने अमेरिकी मतदाताओं को चकित कर दिया और हिलेरी क्लिंटन के उन बयानों ने निराश किया जिनमें वह विश्व शांति, मैत्री जैसे शाब्दिक अलंकरणों का चित्र बना रही थीं जिसमें आतंकवाद एवं आर्थिक समृद्धि मुख्य बिंदु नहीं थे।
सबसे बड़ी बात यह कि हिलेरी क्लिंटन तथा उनके पति पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन कभी भारत के मित्र नहीं रहे। बिल क्लिंटन वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने भारतीय सेना के विरुद्ध हिंदू-आतंकवादी शब्द इस्तेमाल किया था। तत्कालीन विदेशी मंत्री मैडेलीन आलब्राइट की पुस्तक की भूमिका में, उसके बाद भारत में विपक्षी दलों ने यह शब्द लपक लिया। क्लिंटन ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में एक साल तक भारत में राजदूत नियुक्त करने की जरूरत नहीं समझी तथा रूस को क्रायोजेनिक इंजन तकनीक देते समय शर्त लगायी कि वह तकनीक भारत को स्थानान्तरित नहीं की जाएगी। किसी भी व्यक्ति, देश या नेता को समर्थन देने की कसौटी क्या हो सकती है? यह कि वह व्यक्ति या देश कितनी भली-भली बातें करता है या यह कि उससे मेरे देश को कितना लाभ होगा? कूटनीति धार्मिक चंदे देने का काम नहीं है बल्कि उसका आधार विशुद्ध राष्ट्रवाद ही हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रवाद के प्रखर ध्वज को थामे कठोर वाणी प्रहार से अमेरिकी शत्रुओं को भयाक्रांत करने वाले डोनाल्ड ट्रम्प को अमेरिकी नागरिकों ने इसलिए चुना कि वे शत्रु को क्षमा नहीं करेंगे और मित्र का साथ निभाएंगे।
इसी कारण अमेरिकी में भारतीय मूल के हिंदुओं ने क्लिंटन के बजाय डोनाल्ड ट्रम्प को चुना। ट्रम्प के उदय से अब विश्व राजनीति के समीकरण बदलेंगे इससे नई विश्व-व्यवस्था का उदय हो सकता है जिसमें चीन के शी जिन पिंग एक महत्वपूर्ण स्थिति रखेंगे। पाकिस्तान की आतंकवादी-आक्रामकता के विरुद्ध भारत की लड़ाई ज्यादा मजबूत और प्रभावी बनेगी और चीन द्वारा पाकिस्तान को समर्थन में वह तेजी नहीं रहेगी। ट्रम्प के उदय की यूरोपीय संघ को टूटने से बचाने में भी भूमिका हो सकती है। आतंकवाद के निर्मूलन में अब नयी वैश्विक पहल होगी जिसमें भारत की बड़ी भूमिका तय है। यह एक शुभ संकेत है।

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