आखिर टूट गया किसानों के सब्र का बांध

जिस देश में दो तिहाई लोग गांव में रहते हों, वहां ऐसा फैसला लेने के पहले इसके व्यापक परिणामों पर केंद्र सरकार ने विचार क्यों नहीं किया? क्या सरकार ने किसानों की समस्या पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी? एक ओर सरकार कालेधन के लिए आयकर में छूट देने को तैयार है, वहीं दूसरी ओर किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।

sajnaysharmaआखिरकार किसानों के सब्र का बांध टूट ही गया। नोटबंदी के फैसले से परेशान उत्तर प्रदेश के किसानों ने राजधानी लखनऊ में विधानसभा के सामने अपनी आलू और धान की फसलें बिखेर दीं। वहां मौजूद लोगों को मुफ्त में फसल बांट दी। मोदी सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। जिस समय किसान अपना आक्रोश, अपनी बेबसी का सडक़ पर इजहार कर रहे थे ठीक उसी वक्त यहां के तमाम बैंकों में लोग कई घंटों से अपने खाते से अपनी ही मेहनत की कमाई निकालने के लिए कतार में खड़े थे। सवाल यह है कि आखिर किसानों का धैर्य क्यों जवाब दे गया? वे अपनी खून पसीने की उपज को यों की क्यों लुटाने लगे? नोटबंदी के फैसले में कहां कमी रह गई और इसे दूर करने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए? जिस देश में दो तिहाई लोग गांव में रहते हों, वहां ऐसा फैसला लेने के पहले इसके व्यापक परिणामों पर केंद्र सरकार ने विचार क्यों नहीं किया? क्या सरकार ने किसानों की समस्या पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी? एक ओर सरकार कालेधन के लिए आयकर में छूट देने को तैयार है, वहीं दूसरी ओर किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। मोदी सरकार गांवों को डिजिटल करने और लोगों से कैश लेस प्रणाली अपनाने पर जोर दे रही है, लेकिन वह यह भूल गई है कि इसके लिए जरूरी संसाधन देश के तमाम गांवों में नहीं हैं। तमाम गांवों में आज भी बैंक की सुविधा नहीं है। एटीएम नहीं हैं। जहां है भी वहां नगदी नहीं है। ऐसे में किसान जाएं तो कहां। पैसे के अभाव में अनाज की मंडिया सूनी हो चुकी हैं। व्यापारी धन के अभाव में किसानों की फसल खरीद नहीं पा रहे हैं। यही नहीं फैसले के बाद जिस तरह पैसा बदलने और निकालने की लिमिट सरकार ने बांधी उससे भी किसानों को परेशानी उठानी पड़ रही है। सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए एक सप्ताह में पचास हजार निकालने का आदेश जारी किया था। लेकिन यह आदेश तब अमल में आएगा जब बैंक में नगद राशि होगी। रबी की फसल की बुआई होनी है। महंगाई के जमाने में खाद और बीज के लिए पचास हजार पर्याप्त नहीं है। जाहिर है सरकार के फैसले से किसान को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। कुल मिलाकर सरकार के इस फैसले ने कालेधन वालों को कम आम जनता और किसानों को खासी परेशानी में डाल दिया है। किसान तो बर्बादी की कगार पर ही पहुंच गए हैं। जाहिर है उनका धैर्य जवाब देने लगा है।

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