आखिर कब तक ढोते रहेंगे लाशों का बोझ

ओडिशा के दाना मांझी जैसे लोग सरकारी एंबुलेंस सेवा की मदद न मिलने और जेब में पैसे न होने की वजह से पत्नी की लाश कंधे पर ढोने को मजबूर हैं। हैदराबाद के 53 वर्षीय रामुलु को एंबुलेंस का पांच हजार रुपये किराया न दे पाने की वजह से अपनी पत्नी कविता की लाश पैतृक गांव तक कंधे पर रखकर ले जाना पड़ा।

sanjay sharma editor5देश संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। अमीर और गरीब के बीच की खाईं बढ़ रही है। इक्कीसवीं सदी में भी जाति और धर्म के आधार पर इंसानों के बीच खूनी संघर्ष जारी है। देश का विकास केवल आंकड़ों में हो रहा है। हकीकत में आम आदमी लाशों का बोझ कंधे पर ढ़ोने को मजूबर है। ऐसे में जनता को स्वयं तय करना होगा कि उसने अपनी सुरक्षा और विकास की जिम्मेदारी जिसके हाथों में सौंपी है, वह अपनी जिम्मेदारी को निभाने में कामयाब हुआ है या नाकाम रहा है।
हमारे जवान करीब एक महीने से सीमा पर आतंकियों से लड़ रहे हैं। पठानकोट में हमले के बाद से अब तक नौ जवान शहीद हो चुके हैं। सेना आतंकियों का मुंहतोड़ जवाब भी दे रही है लेकिन सीमा पार की लड़ाई कब तक चलेगी, इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। हम कब तक सीमा पर शहीद होने वाले जवानों की गिनती करते रहेंगे, यह भी स्पष्ट नहीं है। वहीं देश की आम जनता को गरीबी खत्म करने और सबके खाते में 15-15 लाख रुपये डालने का सपना दिखाने वाली केन्द्र सरकार गरीबों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधारने में भी फेल रही है। ओडिशा के दाना मांझी जैसे लोग सरकारी एंबुलेंस सेवा की मदद न मिलने और जेब में पैसे न होने की वजह से पत्नी की लाश कंधे पर ढोने को मजबूर हैं। हैदराबाद के 53 वर्षीय रामुलु को एंबुलेंस का पांच हजार रुपये किराया न दे पाने की वजह से अपनी पत्नी कविता की लाश पैतृक गांव तक कंधे पर रखकर ले जाना पड़ा। इतना ही नहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान बैंकों से लिया गया कर्ज न चुका पाने और आर्थिक तंगी की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर हैं। पूर्व सैनिक ओआरओपी का लाभ न मिल पाने की वजह से आत्महत्या कर रहा है। देश में गरीबों की बदहाली और विकास की हकीकत दिखाने वाले न्यूज चैनल पर बैन लगाया जा रहा है। ऐसा करके लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने की कोशिश की जा रही है। जबकि विजय माल्या और अडानी समेत दर्जनों प्रभुत्वशाली लोग करोड़़ों का कर्ज लेकर भी कानून और सरकार के साथ आंख-मिचौली का खेल-खेल रहे हैं। इनके खिलाफ कार्रवाई करने और लगाम लगाने में सरकार भी नाकाम साबित हो रही है।
ऐसे में सवाल उठता है कि देश की सीमाओं पर गोलीबारी कब बंद होगी, गरीबों को अपनों की लाश कंधे पर ढोने से कब मुक्ति मिलेगी, देश का अन्नदाता कब भर पेट खाना खाएगा और बैंकों से करोड़ों रुपये का कर्ज लेने वाले कब सलाखों के पीछे होंगे। इन सवालों के जवाब मिलने जरूरी हैं। इसलिए सरकार को कुछ सकारात्मक कदम उठाना होगा।

Pin It