असैन्य परमाणु करार के निहितार्थ

जहां तक भारत के विकास और ऊर्जा उत्पादन का सवाल है, समझौता निश्चित रूप से प्रभावी होगा। आने वाले दिनों में जब पूरे विश्व से तेल और कोयले के स्रोत खत्म हो जाएंगे तब परमाणु व सौर ऊर्जा ही जीवन का आधार होगा। परमाणु रिएक्टर लगेंगे। ऊर्जा का उत्पादन बढ़ेगा और इसका विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग किया जा सकेगा।

sajnaysharmaअसैन्य परमाणु ऊर्जा को लेकर भारत-जापान के बीच ऐतिहासिक करार हो गया। समझौता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके जापानी समकक्ष शिंजो आबे के बीच लंबी वार्ता के बाद हुआ। सबसे अहम यह है कि कूटनीति के अपने पारंपरिक तरीके को छोडक़र जापान ने पहली बार इस तरह का समझौता किया। कई अन्य करार भी किए गए। भारत के साथ परमाणु करार करने वाले अन्य देशों में अमेरिका, रूस, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया, फ्रांस, नामिबिया, अर्जेंटीना, कनाडा, कजाकिस्तान व आस्ट्रेलिया शामिल हैं। सवाल यह है कि जापान से हुए करार का असर भारत पर किस तरह और कहां तक पड़ेगा? क्या समझौता भारत की ऊर्जा मांग को पूरा कर पाएगा? क्या इसके जरिए देश हरित विश्व की कल्पना को साकार करने में अहम भूमिका निभा सकेगा? क्या यह समझौता भारतीय कूटनीति को नया आयाम देगा? जहां तक भारत के विकास और ऊर्जा उत्पादन का सवाल है, समझौता निश्चित रूप से प्रभावी होगा। आने वाले दिनों में जब पूरे विश्व से तेल और कोयले के स्रोत खत्म हो जाएंगे तब परमाणु व सौर ऊर्जा ही जीवन का आधार होगा। परमाणु रिएक्टर लगेंगे। ऊर्जा का उत्पादन बढ़ेगा और इसका विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग किया जा सकेगा। परमाणु ऊर्जा के प्रयोग से पृथ्वी पर लगातार बढ़ रहे प्रदूषण पर भी नियंत्रण लग सकेगा। इससे भविष्य में एक हरित विश्व का सपना साकार हो सकेगा। जापान परमाणु तकनीक का निर्यात भारत कर सकेगा। यहां अमेरिकी कंपनियां संयंत्र लगाएंगी, जिससे विकास की रफ्तार बढ़ेगी। कूटनीति के लिहाज से समझौता बेहद अहम है। भारत, जापान के साथ ऐसा करार करने वाला पहला देश बन गया है जिसने नाभिकीय अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इसके अलावा यह करार दोनों देशों की सुरक्षा संबंधों को भी मजबूती प्रदान करेगा। हकीकत यह है कि परमाणु हमला झेल चुका जापान चीन से मुकाबले के लिए अब कमर कसने लगा है। इस करार से पड़ोसी देशों पर भी असर पड़ेगा। चीन संयुक्त राष्टï्र परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का विरोध करता रहा है। वह भारत के एनएसजी में शामिल होने की राह में भी रोड़े अटकाता रहा है। जापान ने एनएसजी को लेकर भारत के समर्थन का ऐलान कर दिया है। इस समझौते से चीन को संदेश मिला है कि वह बेवजह विरोध कर रहा है जबकि विश्व बिरादरी भारत के साथ खड़ी है। चीन को इसकी चिंता भी सताने लगी है कि दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर जापान, अमेरिका और अन्य एशियाई देशों के साथ मिलकर भारत उस पर दबाव बनाएगा। कुल मिलाकर ताजा समझौते से विकास की रफ्तार को पंख लगने की उम्मीद तो की ही जा सकती है।

Pin It