अब दिल्ली के प्रदूषण पर सियासत

क्या यहां का प्रदूषण केवल दीवाली में छोड़े गए पटाखों और किसानों द्वारा खेत में जलाए गए फसलों के अवशेषों का नतीजा है? सवाल यह भी है कि जब जनता की जान पर बन पड़ी हो तब क्या सियासी दलों को सियासत करनी चाहिए? क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं कि वे इसके समाधान के बारे में सोचें?

sanjay sharma editor5पिछले एक सप्ताह से दिल्ली के लोगों का दम घुट रहा है। लोग मास्क पहनकर निकलने को मजबूर हैं। हालात बेकाबू हो गए हैं। केजरीवाल सरकार ने आपात बैठक बुलाई है। कुछ फौरी कदम उठाने का भी ऐलान किया है। केंद्र से भी मदद की गुहार लगाई है। वहीं, दिल्ली की जहरीली होती हवा पर सियासत भी तेज हो गई है। इसका ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ा जा रहा है। लोगों ने मास्क पहनकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। सवाल यह है कि दिल्ली की हवा अचानक इतनी जहरीली क्यों हो गई? क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इसे लेकर सरकार को आगाह नहीं किया था? क्या यहां का प्रदूषण केवल दीवाली में छोड़े गए पटाखों और किसानों द्वारा खेत में जलाए गए फसलों के अवशेषों का नतीजा है? सवाल यह भी है कि जब जनता की जान पर बन पड़ी हो तब क्या सियासी दलों को सियासत करनी चाहिए? क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं कि वे इसके समाधान के बारे में सोचें? दिल्ली की हालत यह है कि यहां की खुली हवा में दस घंटे रहना 42 सिगरेट पीने के बराबर हो चुका है। यहां गहरी धुंध छाई है। प्रदूषण सुरक्षित स्तर से 17 गुना अधिक हो चुका है। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने इसकी तुलना घातक गैस चेंबर तक से की है। सरकार ने यहां जनरेटर व वाहनों के न्यूनतम इस्तेमाल की अपील की है। वहीं, दिल्ली सरकार ने इस प्रदूषण का ठीकरा यूपी, पंजाब और हरियाणा पर फोड़ दिया है। उसका कहना है कि यूपी, पंजाब और हरियाणा के किसान खेतों में फसलों के अवशेषों को जला रहे हैं जिसके कारण दिल्ली की हवा जहरीली हो रही है। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सतेंद्र जैन ने अन्य राज्यों से अपील की है कि जब तक किसान फसलों के अवशेष जलाना बंद न कर दें, उन्हें इन्सेंटिव न दिया जाए। वहीं हरियाणा व पंजाब सरकार ने उनके दावे को खारिज करते हुए कहा है कि केजरीवाल को दूसरे पर दोष मढऩे की आदत है। सच यह है कि दिल्ली में बिजली की व्यवस्था चरमरा गई है, लिहाजा यहां हजारों की संख्या में जनरेटर चल रहे हैं। रोजाना हजारों की संख्या में डीजल वाहन दिल्ली से होकर अन्य राज्यों में जाते हैं। इसके अलावा लाखों की संख्या में वाहन दिल्ली में चल रहे हैं। इसके चलते यहां प्रदूषण तेजी से बढ़ा है। यह भी सच है कि फसलों के अवशेष से दिल्ली की आबोहवा पर असर पड़ता है लेकिन यदि रोजाना होने वाले प्रदूषण को कम करने की दिल्ली सरकार कोशिश करे तो ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है। अन्य राज्य सरकारों को भी चाहिए कि किसानों में जागरूकता फैलाए और उन अवशेषों का खाद या अन्य प्रदूषण रहित तरीके से निपटारा सुनिश्चित करें। ऐसा नहीं है कि प्रदूषण का असर दिल्ली तक ही रहेगा। यह अपनी चपेट में आसपास के राज्यों को भी ले सकता है। फिलहाल सियासत नहीं, प्रदूषण से निपटने के लिए कारगर रणनीति बनाने की जरूरत है।

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