हैवान बना ई-रिक्शा, पैडल रिक्शा चलाने वालों के घरों में फांके

-4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। एक बार फिर तकनीक ने मेहनतकश लोगों के मुंह से निवाला छीन लिया है। ई-रिक्शा के रूप में अवतरित नई डिवाइस ने पैडल रिक्शा चलाने वालों के सामने एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। सजीवन जो कि रोजी रोटी कमाने के लिए हरदोई से लखनऊ आये थे और रिक्शा चला कर अपना जीवन यापन करते थे। यही नहीं सजीवन 2 से 3 हजार रुपये अपने घर भी भेजा दिया करते करते थे। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि पैसे घर भेजना तो दूर वो शहर में रह कर अपना गुजारा नहीं कर पा रहे हैं। दरअस्ल सजीवन के साथ न जाने ऐसे कितने लोगों की रोजी रोटी ई-रिक्शा के आने सी छिन गयी है। जीवन की इस अपाधापी में हम इन रिक्शा चालकों का दुख दर्द बिल्कुल ही भूल गये हैं।
सजीवन का दर्द खुलकर उस वक्त सामने आया जपब 4पीएम संवाददाता ने उनसे बात की। सजीवन ने बताया कि हम पहले 100 रुपये कमाते थे वही अब ई-रिक्शा के आने से बस 25 रुपये ही कमा पाते हैं मतलब उनकी आमदनी पर सीधे 75 प्रतिशत का असर हुआ हैै।
बाराबंकी से रिक्शा चलाने लखनऊ आये श्यामू कहते हैं कि अब सवारी तो मिलती नहीं माल-भाढ़ा ढोकर काम चलाना पड़ रहा है। यही नहीं उन्होंने नगर निगम को घेरते हुए कहा कि रिक्शा लाईसेन्स और परमिट के नाम पर नगर निगम कर्मचारियों ने भी रिक्शा चालकों को कमाई का जरिया बना लिया है। वहीं 60 साल के रामनाथ ने जिन्दगी से थक हार के अब तो सब उपर वाले के भरोसे छोड़ दिया है। अपने झुर्रियों वाले चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लाते हुए खुद को भगवान भरोसे छोड़ दिया है। वह कहते हैं कि जितना नसीब में लिखा होगा उतना तो मिल ही जाएगा। अब सोचने वाली बात ये है कि समाज मे बड़ी सख्या में ऐसे लोग हैं जो रिक्शा चलते हैं मजदूरी करते हैं सब्जी बेचते हैं या रोड पे ठेले लगाकर अपना जीवन यापन करते हैं। समाज में बढ़ते वैज्ञानिक और तकनीकी प्रभाव के कारण उनका रोजगार उनसे छिनता चला जा रहा है।

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