हेराल्ड मामले में मोदी पर कांग्रेस का आरोप लगाना गलत

कुलदीप नैयर
‘मैं श्रीमती इंदिरा गांधी की बहू हूं।’ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की इस टिप्पणी को मैं दो सप्ताह बाद भी समझ नहीं पाया हूं। सवाल 90 करोड़ रुपए का है, जो बंद हो चुके नेशनल हेराल्ड ने सरकार से लिया था और उसे वापस नहीं किया। एक अदालत ने रकम वापस नहीं किए जाने को ‘आपराधिक’ कृत्य करार दिया है। सोनिया गांधी के पुत्र राहुल गांधी ने अदालत के फैसले को मोदी सरकार द्वारा उनके और कांग्रेस पार्टी के खिलाफ ‘राजनीतिक बदले की भावना’ से की गई कार्रवाई तक कह डाला। जबकि यह अदालत का फैसला है। इसमें सरकार कहां से आती है?
जनता के भय से कांग्रेस अब अपना रुख बदल रही है और राहुल गांधी की टिप्पणी को अदालत के फैसले से अलग बता रही है। कांग्रेस शासन के पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने राहुल की इस गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी को नए तरीके से मोड़ा है और इसे कांग्रेस के खिलाफ सरकार द्वारा बदले की भावना से की गई कार्रवाई करार दिया है। उनकी बात स्वीकार करने लायक नहीं है, क्योंकि राहुल की टिप्पणी अदालत के फैसले के एक दिन बाद आयी थी।
दरअसल, सोनिया और राहुल दोनों ने ही कर्ज, जिसकी अदायगी वे नहीं करना चाहते हैं, को राजनीतिक रंग दिया है। मां और बेटे, दोनों ने अनावश्यक तरीके से मोदी सरकार और भाजपा को लपेटा है। जबकि इस मामले में पार्टी और प्रधानमंत्री कहां से आते हैं? सोनिया गांधी ठीक उसी तरह का व्यवहार कर रही हैं, जिस तरह का व्यवहार उनकी सास इंदिरा गांधी ने किया था। क्या सोनिया अगर सत्ता में होतीं तो वे अपनी सास के नक्शेकदम पर चलतीं, जिन्होंने संविधान को निलंबित करने, प्रेस का गला घोंटने और बगैर मुकदमे के लाखों लोगों को जेल में डालने के लिए आपातकाल लगा दिया था? इलाहाबाद हाईकोर्ट में हारने के बाद इंदिरा गांधी हैरान हो गई थीं। हाईकोर्ट ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें छह साल के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। लेकिन लोकसभा से इस्तीफा देने के बजाए, उन्होंने आपातकाल लगा दिया और अपने अवैध चुनाव को छुपाने के लिए चुनाव से संबंधित कानून को, तत्काल प्रभाव से संशोधित कर दिया था। उन्होंने इसे संसद से मंजूर करा लिया, जहां सही मायने में कोई विपक्ष था ही नहीं। संसद की मंजूरी आसानी से ले लेने के लिए उन्होंने विपक्षी सदस्यों को बगैर मुकदमे के गिरफ्तार कर लिया था। कांग्रेस अभी तक इस बात को समझ नहीं पायी है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सत्तारुढ़ दल। मूल सवाल जिसका जवाब दिए जाने की जरूरत है, वह यह है कि संस्थाओं की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक संरचना को मजबूती प्रदान करती है। इन पर प्रहार करना उन संस्थाओं पर प्रहार है जो लोगों के अधिकारों की रक्षा करती है।
मोदी सरकार के चाहे जितने भी दोष हों, फिर भी बहुलवाद की अवधारणा को कमजोर करने के लिए पहले से पारित कानूनों के लिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। असली अपराधी भारतीय जनता पार्टी है, जिसका उद्देश्य हिंदु राष्ट्र है। यह धर्मनिरपेक्षता की उस मूल अवधारणा को चोट पहुंचाती है, जिसे लोकतांत्रिक भारत ने अपने संविधान में शामिल कर रखा है। मोदी सरकार अतिवादी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से प्रभावित है। संविधान की मूल संरचना को चुनौती देने वाला कोई भी वैसा कदम उठाने में भाजपा डरती है। उदाहरणस्वरूप, यह बहुलवाद की अवधारणा के साथ छेड़छाड़ करने का साहस नहीं करती, क्योंकि पार्टी को पता है कि अधिकांश भारतीय हिंदुत्व को बर्दाश्त नहीं करेंगे, जो धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के विपरीत है।
फिर भी, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मोदी सरकार असहिष्णुता का ऐसा माहौल बना रही है, जो न सिर्फ मुसलमानों बल्कि पूरे बुद्धिजीवी वर्ग को चोट पहुंचा रही है। देश को दक्षिणपंथ की ओर ले जाने की कोशिश किसी भी तरह देश की मदद नहीं कर सकती, जिसे विभिन्न क्षेत्रों में सरकार द्वारा अधिक से अधिक निवेश करने की जरूरत है ताकि विकास की गति तेज हो सके। इस संदर्भ में, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को बधाई दी जानी चाहिए। उन्होंने पाकिस्तान के साथ गतिरोध को तोड़ा है। सच में, उन्होंने पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए भारत की इस शर्त को बदलने की पहल की है कि पाकिस्तान जब तक आतंकवाद बंद नहीं करता, उससे बातचीत नहीं हो सकती। उनकी पहल भारत के हित में है। ऐसा पहले किया जाना चाहिए था। कई साल अनावश्यक रूप से बर्बाद कर दिये गये।
उनकी पहल की पूरे देश में प्रशंसा हुई है। नई दिल्ली लोगों की इच्छाओं का सम्मान करती है तथा पाकिस्तान के साथ सामान्य पड़ोसी की तरह रहना चाहती है। समस्या पाकिस्तान के साथ है, जहां धार्मिक अतिवादियों और सेना का प्रभुत्व है। दोस्ती का रास्ता नहीं अख्तियार करने के लिए पाकिस्तान पर दबाव है। फिर भी इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि कोई और रास्ता नहीं है। यह चाहे कल हो या परसों, दोनों देशों के लिए सिर्फ यही एक रास्ता है। वे जितनी जल्द इस बात को समझ लें, भारत-पाकिस्तान की जनता के लिए उतना ही बेहतर होगा। दोनों देशों के कुछ लोग इस बात को महसूस करते हैं। लेकिन उनकी ताकत अतिवादियों की तुलना में न के बराबर है और इसलिए वे कोई मायने नहीं रखते।

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