हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती: एनके दुबे

Capture‘लहरों से डर के नौका पार नहीं होती, हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती।’

यह पंक्ति फिटजी के सेंटर हेड एनके दुबे पर सटीक बैठती है। उन्होंने अनेकों समस्याओं से लडक़र न केवल अपने जीवन में उजाला किया बल्कि अपनी योजना और शिक्षा प्रणाली के कारण आईआईटी और जेईई जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में छात्र-छात्राओं को कामयाबी दिला कर राजधानी का मान बढ़ाया। ऐसे में जब भी बेहतर शिक्षा व सफल निर्देशन की बात होती है तो फिटजी जैसे इंस्टीट््यूट का नाम सबसे पहले लोगों की जुबान पर आता है। 4 पीएम की संवाददाता हिना खान से एनके दुबे ने अपने अनुभवों को साझा किया।

क्या आपने फिटजी से अपने कॅरियरकी शुरुआत की है?
यह बात पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि फिटजी संस्थान के साथ तो मैं काफी समय बाद जुड़ा हूं। मैने सबसे पहले नोएडा में मैथ के टीचर के तौर पर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था। उसके बाद लखनऊ आया।

किसी और क्षेत्र में जाने की बजाय आपने एजुकेशन को ही क्यों चुना?
मेरे अंदर शुरुआत से ही पढ़ाने का पैशन था। जब मैं ग्यारहवीं क्लास में था, तो मेरी छोटी बहन हाईस्कूल में थी। मैं उसे रोज पढ़ाया करता था, मुझे यह काम बहुत अच्छा लगता था। मैथ मेरा सबसे पसंदीदा सब्जेक्ट था। इसी वजह से अपने बचपन के पैशन को मैने दोबारा अपनी ताकत बना लिया।

नोएडा जैसे एजुकेशन हब को छोडक़र लखनऊ आने की क्या वजह रही?
मैं 2003 में फिटजी से जुड़ा। वहां गणित के अध्यापक के रूप में छात्रों को पढ़ाने का बहुत ही अच्छा रिस्पांस मिला। इसलिए मैनेजमेंट ने लखनऊ में नया सेंटर खोलने की जिम्मेदारी सौंप दी। उसे सहर्ष स्वीकार करके मैं लखनऊ आ गया। यहां आकर फिटजी के सेंटर को स्टैब्लिश किया। लेकिन संस्था को लखनऊ में स्थापित करने के दौरान तमाम तरह की मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा।

अंजान शहर में सेंटर को कामयाबी के शिखर तक पहुंचाने में क्या-क्या दिक्कतें आईं?
फिटजी को लखनऊ में स्थापित करना बड़ी चुनौती थी। नये शहर में शुरुआती दौर में बैठने के लिए ढंग की जगह तक नहीं थी। इसके बावजूद किसी तरह संस्था की शुरुआत हुई। उस वक्त संस्था में पढऩे वाले बच्चों की संख्या बहुत कम थी लेकिन मैने सभी चुनौतियों और कठिनाइयों का डटकर मुकाबला किया, जिसका नतीजा यह है कि आज लखनऊ में हमारा इंस्टीट््यूट सबसे कामयाब माना जाता है।

क्या आपने आर्मी में भी काम किया है?
जी हां, आर्मी एक ऐसा प्रोफेशन है, जिसे न तो कोई जबरदस्ती चुनता है और न ही उसे छोड़ता है। आर्मी जैसी टफ लाइफ केवल वही लोग चुन सकते हैं, जिनके अंदर देश प्रेम का जज्बा कूट-कूट कर भरा होता है। ऐसे ही जज्बे के साथ मैने भी आर्मी को ज्वाइन किया था लेकिन मैं ज्यादा दिन तक वहां काम नहीं कर पाया। शायद होनी को कुछ और ही मंजूर था। मुझे आर्मी में केवल डेढ़ ही साल हुए थे कि मेरा एक्सीडेंट हो गया, जिसमें मैं बुरी तरह से घायल हो गया था। इसके बाद मुझे खुद भी नहीं पता था कि मैं दोबारा कभी चल पाउंगा या नहीं। इसी वजह से मुझे आर्मी छोडऩा पड़ा।

आपका आर्मी एक्सपीरियंस कैसा रहा?
मुझे आर्मी के रूल रेग्यूलेशन, वहां फौजियों के काम करने का ढंग और कठिन परिश्रम काफी बेहतरीन लगता था। इसलिए कठिन परिश्रम और संघर्षों का डटकर मुकाबला करने की प्रवृत्ति मुझे आर्मी से सौगात के तौर पर मिली है। आज उसी की वजह से अपने काम को बेहतर ढंग से कर पा रहा हूं। जहां तक अनुभवों की बात है, तो आर्मी से मैने तीन चीजें सीखी हैं। पहला ईमानदारी से काम करना, दूसरा हार्डवर्क और तीसरा टीम वर्क। इसलिए मेरे अंदर हफ्ते के सातों दिन काम करने की क्षमता है। मैं अपनी कामयाबी की सबसे बड़ी वजह आर्मी के एक्सपीरियंस को ही मानता हूं।

आपका इंस्टीट््यूट अन्य संस्थानों से कैसे अलग है?
मैं शिक्षा को अनमोल मानता हूं। इसे न तो खरीदा जा सकता है और न ही बेचा जा सकता है। आजकल बच्चे अपने कॅरियर को लेकर काफी सतर्क हैं। वह कॅरियर के साथ इनकम पर विशेष ध्यान देते हैं। इसी वजह से युवाओं में इंजीनियर और डॉक्टर बनने की चाहत तो दिखती है लेकिन वह टीचर बनने से परहेज करते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह शिक्षकों की इनकम कम होना है। इस धारणा को बदलने की दिशा में हम लगातार काम कर रहे हैं। हमने अपने यहां पढ़ाने वाले टीचरों का एक अलग ही स्टेटस डेवलप किया है, जो समाज में टीचर्स को एक अलग मुकाम और पहचान दिलाता है। हम अपने यहां पढ़ाए जाने वाले कोर्स में बच्चों के ऊपर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं डालते हैं। फिटजी में पढ़ रहे बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में भी भाग लेते हैं। हम अपने संस्थान में बैच की निर्धारित क्षमता से अधिक बच्चों की भर्ती नहीं करते हैं। समय-सयम पर अभिभावकों और शिक्षकों की मीटिंग आयोजित की जाती है। शिक्षकों और बच्चों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने की कोशिश की जाती है। इसी वजह से हमारा संस्थान दूसरों से अलग है।

आपके जीवन की उपलब्धियां क्या है?
फिटजी संस्थान के माध्यम से पिछले 12 सालों से लगातार हमने राजधानी को आईआईटी और जेईई का टॉपर दिया है। किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना में सबसे अधिक हमारे यहां के बच्चे सेलेक्ट हुए हैं। हमने विभिन्न स्कूलों के साथ मिलकर ऐसा प्रोग्राम और माहौल डेवलप किया है, जो बच्चों को कम प्रेशर में कम्पटीशन की बेहतर तैयारी करवाने में मदद करता है। हमने अपने संस्थान में पढऩे वाले बच्चों को स्ट्रेस फ्री एनवायरमेंट दिया है। इसे हम बड़ी उपलब्धि मानते हैं।
आप किसको अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं?
मैं भगवान को सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत मानता हूं। उसके बाद अपने गुरू और माता-पिता को अपनी प्रेरणा समझता हूं। मेरी पत्नी हर कदम पर मेरा साथ देती हैं। यही मेरी ताकत और तरक्की की वजह है।

क्या आप हमें अपने जीवन की कोई यादगार घटना बताना चाहेंगे?
जब मेरा एक्सीडेंट हुआ था, उस वक्त मैं काफी डिप्रेशन में आ गया था। मन में हमेशा एक दुविधा रहती थी कि मैं दोबारा कभी चल पाउंगा या नहीं। उस समय मेरे गुरू दीपक राजेय ने मेरा हौसला बढ़ाया और कहा कि हर चीज अच्छे के लिए होती है। शायद इस घटना के पीछे भी कोई बेहतरीन उद्देश्य छिपा हो। इसलिए सब कुछ भूलकर आगे की सोचो। उस समय मैने अपने गुरू की बात को गांठ बांध लिया और अपने अंदर गजब की उर्जा महसूस की है। आज परिणाम सबके सामने है।

भविष्य में आपका क्या प्लान है?
मेरा सपना है कि मैं भविष्य में एक ऐसा स्कूल खोलूं, जिसमें एक रिच लाइब्रेरी हो। बच्चों के लिए अच्छा प्ले ग्राउंड और पढ़ाने के लिए बेहतरीन टीचर हों। बच्चों को स्कूल में मानसिक व शारीरिक विकास के लिए आवश्यक सारी सुविधाएं मुहैया करा सकूं। मैं जाति और धर्म से ऊपर उठकर बच्चों को देश की उन्नति के लिए तैयार करना चाहता हूं।

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