हाईटेक बनने की चाहत में मिल रही बीमारी की सौगात

  • बुजुर्गों को आज भी घड़े का पानी पीकर मिलता है सुकून
  • फ्रिज का ठंडा पानी पीने की वजह से तेजी से फैल रही गले की बीमारी

Captureअभिषेक शाही
लखनऊ। एक वो दौर था जब लोग घड़े का पानी पीकर अपना गला तर करते थे। घड़े के पानी में मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू, शीतलता और मीठेपन का एहसास होता था। घर के किसी कोने में रखा घड़ा शान की बात मानी जाती थी लेकिन आजकल घरों में मिट्टी का घड़ा रखना शान के खिलाफ है। लेकिन घरों के बड़े बुजुर्ग आज भी घड़े की अहमियत को समझते हैं। उन्हें फ्रीज की बजाय घड़े का पानी पीकर ज्यादा सुकून मिलता है। इसी वजह से बाजार में हाईटेक तकनीक वाले मिट्टी के घड़े भी उपलब्ध हैं, जिनकी खासियत आजकल के मासूम बच्चों को तो मालूम भी नहीं है।
आधुनिकता की दौड़ में हमारा देशी फ्रिज यानी मिट्टी का घड़ा गुम होता जा रहा है। इसका इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगातार कम हो रही है। शहर से लेकर गांव तक इलेक्ट्रानिक फ्रिज का इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जबकि आयुर्वेद के अनुसार मिट्टी के घड़े में रखे पानी को पीना स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक होता है। राजधानी के जाने-माने चिकित्सक शैलेश अग्रवाल के मुताबिक घड़ा यानि देशी फ्रिज हमारे लिए विरासत की पहचान है। हमारे पूर्वज वर्षों से शीतल जल का भंडारण करने के लिए मिट्टी के घड़े का इस्तेमाल करते रहे हैं। घड़े का पानी पीने से स्वास्थ्य पर काफी अनुकूल असर पड़ता है। घड़े की खासियत यह है कि इसमें रखे पानी की शीतलता हमारे शरीर के तापमान के अनुसार होती है। इस वजह से खांसी, जुकाम, सर्दी और गले से संबंधित बीमारियां होने का खतरा नहीं होता है। जबकि फ्रिज का पानी हमारे स्वस्थ्य पर बुरा असर डालता है। कई बार तेज धूप से आने के बाद फ्रिज का पानी पीने से खांसी व जुकाम की समस्या हो जाती है। लेकिन घड़े में रखा पानी उतना ही ठंडा होता है, जितना हमारे शरीर को जरूरत होती है। इसी वजह से घड़े का पानी नुकसान नहीं करता है।
घड़े का पानी पीने के लाभ
गोमती नगर इलाके में मिठाई वाला चौराहा पर करीब 30 वर्षों से घड़ा बेचने वाले किशोर बताते हैं कि घड़े के पानी में मीठापन होता है। प्यास लगने पर फ्रिज की अपेक्षा घड़े का पानी ज्यादा पी सकते हैं। घड़े में पानी भरकर रखने से आने वाली मिट्टी की सोंधी खुशबू भी पानी का स्वाद बढ़ा देती है। देशी फ्रिज यानी घड़ा बहुत ही सस्ता होता है। इसकी कीमत 50 रुपये से 80 रुपये तक है। जिन घड़ों में टोंटी लगी हुई है, उनकी कीमत 100 से 150 रुपये तक है। इन घड़ों की कीमत साइज के अनुसार कम और ज्यादा भी है। उन्होंने बताया कि अब लोग हाईटेक होने के चक्कर मेंं घड़े को भूलते जा रहे हैं। करीब 10 साल पहले हम 25-30 घड़े एक दिन में बेच लेते थे लेकिन आज बहुत मुश्किल से दिन भर में 5 से 6 घड़े ही बेच पाते हैं। यदि लोग घड़े का इस्तेमाल करने लगें तो हमारी सदियों से चली आ रही देशी कला को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही मिट्टी के बरतनों को बनाने के व्यवसाय में लगे कुम्हारों को भुखमरी से बचाने में मदद होगी। यदि हर घर में मिट्टी के घड़ों का इस्तेमाल होने लगे तो युवाओं को कुम्हार का परम्परागत काम छोडक़र रोजगार के अन्य विकल्पों की तरफ भागने से राहत मिलेगी।
घड़ा बनाने में परेशानियां
कुम्हार किशोर के मुताबिक आजकल घड़ा बनाने में काफी दिक्कतें सामने आ रही हैं। अब हमें घड़ा बनाने के लिए मिट्टी उतनी आसानी से नहीं मिल पाती है। मौसम भी हमारे व्यापार के अनुकूल नहीं है। यदि गर्मी अधिक पड़ती है, तो घड़ा काला पड़ जाता है और ग्राहक इसे लेने से इंकार कर देते हैं। वहीं बारिश, आंधी और तूफान की वजह से भी घड़े को नुकसान होता है। जबकि हमने घड़े को आधुनिक करने के लिए नल तक लगा दिया है। इसी वजह से घड़े की लागत भी बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि आज कुम्हारों की स्थिति इतनी दयनीय हो गयी है कि उनके बच्चे अपने पारम्परिक व्यवास को छोडक़र दूसरे कामों को करने लगे हैं।

देशी फ्रिज की खासियत
दशी फ्रिज के निर्माण में मिट्टी और बालू का उपयोग होता है। घड़े को ढकने के लिए विशेष आकृति का ढक्कन भी बनाया जाता है। इससे घड़े के अंदर हवा का प्रवेश भी आसानी से हो जाता है। इसके अलावा फ्रिज के अंदर रखे बालू की वजह से पानी की शीतलता देर तक बरकरार रहती है। इतना ही नहीं देसी फ्रिज के अंदर का तापमान, वातावरण के तापमान से दस डिग्री तक कम कर देता है। इसलिए घड़े में रखा पानी सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक बना रहता है। आलम ये है कि कृषि विभाग ने इसको देसी फ्रिज के रूप में प्रचार-प्रसार करने का काम भी शुरू कर दिया है।

साफ पानी के नाम पर गंदा कारोबार
जिले में साफ और ठंडा पानी उपलब्ध कराने वाली दुकानें कुकुरमुत्ते की तरह खुली हुई हैं। इन दुकानों का न तो पंजीकरण है, न ही पानी को फिल्टर करने की सही तकनीक का इस्तेमाल होता है। बाजार में ठंडे पानी के नाम पर डिब्बे, बोतल और प्लास्टिक की थैलियों में भरकर अशुद्ध जल बेचा जा रहा है। इंसान आंख मूंद कर 15-18 रुपये लीटर के हिसाब से मिनरल वाटर समझ कर खरीद और पी रहा है। जबकि हकीकत में ऐसे पानी बेचना अवैध है।

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