हमारे ‘गरीब’ नेताओं की वेतन वृद्धि पर हंगामा क्यों

 तरूण विजय
कभी सामान्य रूप से किसी नेता को बाजार में खरीदारी करते देखा है आपने? ऐसा हो ही कैसे सकता है। उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाएगी। विरोधी कहेंगे- पैदल हो गए हैं बेचारे। अगर कभी ऐसा हो भी तो उसका दृश्य कुछ ऐसा होगा- आठ-दस चैनल वाले कैमरों के प्रकाश में खान मार्केट या मालाबार हिल या एंटॉप हिल में जाएंगे किसी दुकान में घुसेंगे, फिर हंसेंगे और एकाध चाकलेट या कपड़ा लेकर कुछ ऐसा बयान देकर घर लौटेंगे- देखिए हम सामान्य जन हैं, गरीबी और बदहाली से भरे देश में शानो शौकत से रहना खराब मानते हैं। घर आकर थक कर चूर हुए से अपने लोगों से कहेंगे- आपको क्या कहें, तनिक बाजार गए कि लोगों ने घेर लिया, ऑटोग्राफ लेने वालों की भीड़, बाहरी बुक स्टोर वाले ने तो कई नई किताबें भेंट कर दीं, थक गए भाई!
दुनिया में भारत ही ऐसा देश होगा जहां बेइंतिहा अमीर नेता, असीमित धन से युक्त एकड़ों में फैले बंगलों के आदी हो चुके हैं। भरी तिजोरियों वाले गांव, गरीब, बदहाल, दरिद्र, भारत की तस्वीर बदलने की बातें करते हैं। उनसे आपका मिलना कठिन, बतियाना असंभव, सहज भाव से उनके साथ उठना-बैठना कल्पनातीत। पर वे मसीहा हैं। हमारे नेताओं का कोई सामान्यजन, मध्यवर्गीय व्यक्ति मित्र हो ही नहीं सकता। मर्सडीज, बीएमडब्ल्यू वाले, गरमियां अमेरिका में बिताने वाले, चुनाव में दो-पांच-दस करोड़ देने वाले, उनके घर, परिजन के खर्चे और नखरे उठाने वाले, उनकी शान में कसीदे पढऩे वाले, उनके दरबारी ही उनके निकट या मित्र होते हैं। लेकिन उन्तीस-तीस साल बाद कभी बाजार जाने या साधारण पल जीने का इश्तिहार इतना बंटता है कि तौबा।
एक बार भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक अध्यक्ष दत्तोपंद ठेंगडी ने एक आपबीती सत्य घटना सुनाई। वे महाराष्ट्र के एक स्टेशन से दिल्ली आ रहे थे। सेकेंड एसी में आरक्षण था। तभी एक बड़े राजनीतिक नेता उसी गाड़ी से दिल्ली जाने आए। ठेंगडी जी को देखकर नमस्कार किया, पूछा किस डिब्बे में आपका आरक्षण है। बताया सेकेंड एसी में। वे आश्चर्य से बोले नहीं नहीं आपको फर्स्ट एसी में चलना चाहिए। सेकेंड एसी या स्लीपर में चलना मीडिया को बताने के लिए तो ठीक है, पर वहां फालतू के बहुत से लोग मिल जाते हैं, तरह-तरह के सवाल करते हैं। तंग करते हैं। फर्स्ट एसी में आराम से सफर होता है। ठेंगडी जी मुस्कराए- बोले मैं भी फालतू का आदमी हूं, उन्हीं लोगों से दो मिनट बात करने का जो सुख है वह फर्स्ट एसी में कहां?
ऐसे नेताओं के पास तीन-चार-पांच सौ करोड़ से कम पैसे कहा होते हैं। इनकी गाडिय़ां, इनके त्योहार, इनके पारिवारिक आयोजन, इनके दौरे, इनके परफ्यूम और धार्मिक रीति-रिवाजों पर दावतों के खर्च, विदेशों में इनके बच्चों की पढ़ाई और मीडिया का जबरदस्त मैनेजमेंट इनकी गरीबी और बेचारगी का जीत-जागता सबूत है। राजनीति दरअसल मुनाफे और संपदावृद्धि का सौदा हो गयी है। इसे घाटे का सौदा बनाने वाला चाहिए। अमीरों में तैरते हुए सांसद बनना, बड़े-बड़े फार्म हाउसों के प्रभुओं का अलंकृत भाषा में गरीबी और दयनीय भारतीयों पर बौद्धिक विलास करना इतना सामान्य है कि लगता है, संसद की सब्सिडी पर, बेहद कम दामों पर भी चाय देने की प्रथा बंद होनी चाहिए ही, बल्कि वहां सांसदों के भोजन पर पांच प्रतिशत अधिभार जोड़ कर उस पैसे पर बेचारे चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के बच्चों के शिक्षा फंड या मध्याह्न फलाहार को बना देना चाहिए। जो दस रुपये का भोजन खाकर सौ रुपए टिप दे देते हैं, उन्हें सब्सिडी क्यों?
गरीब देश के अमीर नेताओं के चुनाव खर्च दिमाग पलटने वाले साबित होते हैं। कभी न्यूयार्क में रंगपिकर्स पार्टियां होती थीं। धनकुबेर, फिफ्थ एवेन्यू के रंगीन वातावरण में गरीब फटेहाल, कूड़ा बटोरने वालों की पैंट पहन दावतें करते थे। धन के अतल में विचरण करते-करते जो बोरियत होती है, उसे दूर करने के लिए वे गरीबी का लबादा ओढ़े तनिक ‘थ्रिल’ महसूस करते थे। बड़ा अच्छा लगता था। जैसे पांच सितारा होटल में कैंसर मरीजों की मदद के लिए एक दानपात्र रखा रहता है, जैसे दाऊद एब्राहीम या हाफिज सईद के कमरे में किसी तरह कोई आध्यात्मिक सदाचार वाली पंक्ति दीवार पर टंगी हो, वैसे जनता से परहेज कर अपने धन-वैभव के प्रति आसक्ति रख कर नेता जनता की सेवा करते, सहानुभूति जताते, गरीब बच्चों को गोदी में उठाकर उनकी बहती नाक अपनी साड़ी और अंगवस्त्र से पोंछते हुए फोटो खिंचवाने वाले नेता सच में बड़े गरीब, बदहाल, सहानुभूति के पात्र होते हैं।
अभी एक मुख्यमंत्री ने पांच करोड़ रुपए की बस ली है, कहीं इन नेताओं के लिए पचहत्तर सौ करोड़ रुपये के विमान लिए जाते हैं, धूप में तप कर सौ-सौ लोग मर जाते हैं। बुंदेलखंड़, तेलंगाना, आंध्र, बिहार में गरमी से मरने वाले न तो विदेशी होते हैं और न ही किसी दूसरे ग्रह के निवासी। वे भारतीय जन होते हैं।
इन नेताओं की गरीबी अवश्य दूर होनी चहिए विमान में एक साहित्य मिलता है, जिसमें लिखा होता है विमान के डूबने की स्थिति में पहले स्वयं ऑक्सीजन का मास्क ओढ़ें फिर दूसरों को बचाएं। इसी तरह गरीबों की गरीबी दूर करने के लिए अगर नेताओं को समर्थ बनाना है तो पहले इनकी गरीबी दूर करनी ही पड़ेगी। अब यह बात अलग है कि अगर किसी की गरीबी दाल-रोटी और कमरे के घर से दूर होती है तो किसी भी गरीबी गुच्ची, बुलगारी और रोलेक्स से बेचारे गरीब नेताओं पर कुछ तो तरस खाइए। वोट प्रभु!

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