स्वास्थ्य महकमे से डेंगू को लेकर कोई उम्मीद न करे जनता

प्रमुख सचिव एके सिन्हा के सामने सीएमओ लखनऊ ने कहा

  • डेंगू से बचाव को लेकर स्वास्थ्य महकमे ने खड़े किए हाथ
  • राजधानी में मात्र 15 कर्मचारियों के भरोसे 33 लाख की आबादी
  • वर्ष 1973 से अब तक मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम में नहीं बढ़ी कर्मचारियों की संख्या

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। राजधानी में डेंगू से होने वाली मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करने की जगह तक नहीं मिल पा रही है। मरीजों को एलाइजा टेस्ट की रिपोर्ट मिलने में तीन से चार दिन का समय लग रहा है। आम जनता डेंगू को लेकर काफी दहशत में है। ऐसे में प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण अरुण कुमार सिन्हा के सामने सीएमओ एसएनएस यादव का यह कहना कि लखनऊ की करीब 33 लाख जनसंख्या पर मात्र 15 कर्मचारियों के भरोसे मलेरिया उन्मूलन का काम कर पाना मुश्किल है। इसलिए जनता को स्वयं डेंगू से बचाव का प्रबंध करना होगा। इससे स्वास्थ्य विभाग की हकीकत उजागर हो रही है।
शहर के विभिन्न सरकारी अस्पतालों से लेकर निजी अस्पतालों में रोजाना डेंगू के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस सीजन में अब तक शहर में डेंगू बुखार के संदिग्ध मरीजों की संख्या 200 का आंकड़ा पार कर चुकी है। अब तक 10 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं स्वास्थ्य अपनी गर्दन बचाने और आंकड़ों की बाजीगरी के खेल में व्यस्त हैं। सीएमओ कार्यालय में मौजूद आंकड़ों के अनुसार डेंगू से केवल एक मौत की पुष्टिï हुई है। यहां तक की केजीएमयू में एक सप्ताह के अंदर डेंगू से केवल एक बच्ची की मौत बतायी जा रही है। जबकि यहां पर सोमवार की रात ही डेंगू से पीडि़त एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है, उस व्यक्ति में डेंगू पॉजिटिव पाया गया था। इन सब के बावजूद राजधानी का स्वास्थ्य महकमा शहर में डेंगू फैलने की बात को कोरी अफवाह मान रहा है। मौजूदा समय में सिविल अस्पताल में 18 मरीज, बलरामपुर अस्पताल में चार मरीज, लोहिया अस्पताल में 10 मरीज और केजीएमयू में 14 मरीज डेंगू से पीडि़त मिले हैं। इसमें से केजीएमयू के गांधीवार्ड में भर्ती दो मरीजों की हालत चिन्ताजनक बनी हुयी है। वहीं लोहिया अस्पताल में भर्ती मरीजों की हालत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। दरअसल स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को गंभीरता से लेकर जनता को राहत दिलाने की बजाय स्वास्थ्य महकमे के आलाव अधिकारी एसी कमरों मे बैठ कर आंकड़ों की बाजीगरी का खेल खेलते हैं। जिसे में सफाई अभियान और डेंगू व मलेरिया से बचाव के लिए छिडक़ाव का काम केवल कागजों पर चल रहा है। हकीकत में कहीं भी उसका असर नजर नहीं आ रहा है।

एक महीने में डेंगू से 10 मौतें

राजधानी में डेंगू ने 10 जिंदगियों को छीन लिया है। शहर में इस साल डेंगू की वजह से सबसे पहली मौत आरएलडी के प्रदेश अध्यक्ष मुन्ना सिंह चौहान की हुई थी। इस घटना से राजनीतिक गलियारों में भी डेंगू को लेकर दहशत का माहौल देखने को मिला। वहीं मुन्ना सिंह चौहान के बेटे ने चिकित्सकों पर लापरवाही का आरोप भी लगाया। जनता ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि यदि इतने बड़े नेता के इलाज में चिकित्सक लापरवाही बरत सकते हैं,तो आम जनता की विसात ही क्या है। डेंगू से दूसरी मौत मेयो अस्पताल में भर्ती निलय सिंह की हुई। उनकी मौत के बाद परिजनों ने जमकर हंगामा किया था। उसके बाद लोहिया अस्पताल में इलाज करवा रहे डेंगू पीडि़त एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इस सूचना से स्वास्थ्य महकमे में हडक़म्प मच गया था। स्वास्थ्य महकमे के अधिकारियों ने डेंगू से होने वाली मौतों को मानने से इंकार कर दिया था। उसके बाद पीजीआई में भर्ती भूतनाथ चौकी इंचार्ज उप निरीक्षक केजी शुक्ला की मौत हुई थी। डेंगू से पांचवी मौत ृग़्राम कमता निवासी दुर्गेश की हुई थी, उनका निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था लेकिन वहां से हालत बिगडऩे पर लोहिया अस्पताल ले जाया गया। जहां पहुंचने पर उसकी मौत हो गई। दुर्गेश को कई दिनों से तेज बुखार आ रहा था। इसी प्रकार हरिहर नगर निवासी रूबी पाण्डेय की मौत भी डेंगू की वजह से ही हुई थी। रूबी की हाल ही में पोस्ट ऑफिस में नौकरी लगी थी। इसके बाद दो दिनों में केजीएमयू में एक वयस्क तथा एक बच्ची की डेंगू बुखार से मौत हो चुकी है। वहीं मोहनलाजगंज में डेंगू बुखार से पीडि़त एक व्यक्ति की निजी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। इस तरह अब तक केजीएमयू में तीन, पीजीआई में दो और निजी अस्पताल में इलाज करा रहे पांच मरीजों की डेंगू से मौत हो चुकी है।

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