स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़

sanjay sharma editor5“ब्रेड बनाने के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले आटे के चौरासी फीसद नमूनों में पोटेशियम ब्रोमेट और पोटेशियम आयोडेट मिले हैं, जिसके लगातार सेवन से कैंसर और थायराइड जैसी बीमारियां हो सकती हैं। अगर सीएसई की जांच और उसके नतीजे सही हैं तो सवाल है कि इतने सालों से व्यापक पैमाने पर जितने लोग ब्रेड खा रहे हैं, अगर उन्हें इसी वजह से कोई गंभीर बीमारी हुई होगी तो उसके लिए कौन जिम्मेवार होगा!”

वर्तमान में एक बात तो तय है कि खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियों को किसी के स्वास्थ्य से कोई सरोकार नहीं है। उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने लाभ से मतलब है। जनसामान्य के बीच एक आम धारणा बनती जा रही है कि बाजार में मिलने वाली हर चीज में कुछ न कुछ मिलावट जरूर है। जनसामान्य की चिंता स्वाभाविक ही है। आज मिलावट का कहर सबसे ज्यादा हमारी रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर ही पड़ रहा है। संपूर्ण देश में मिलावटी खाद्य-पदार्थों की भरमार हो गई है। नकली दूध, नकली घी, नकली तेल, नकली चाय पत्ती आदि सब कुछ धड़ल्ले से बिक रहा है। आए दिन अखबारों में पढऩे को मिलता है कि कई खाद्य पदार्थ के नमूने फेल हो गए। लेकिन अबकी बार जो रिपोर्ट सामने आई है वह काफी चिंताजनक है।
अमूमन आम से लेकर खास वर्ग तक में रोज नाश्ते में खाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला ब्रेड में मिलावट की खबर है। सीएसई यानी दिल्ली स्थित गैर-सरकारी संगठन विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र के ताजा अध्ययन ने जिस तरह ब्रेड में कैंसर जैसी घातक बीमारी के तत्व पाए जाने का खुलासा किया है, वह ज्यादा बड़ी चिंता की वजह है। सीएसई ने यह दावा दिल्ली-एनसीआर के इलाके में पिछले एक साल के दौरान लिए गए नमूनों की जांच खुद करने के अलावा दूसरी प्रयोगशालाओं में कराने के बाद किया है। जांच के मुताबिक ब्रेड बनाने के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले आटे के चौरासी फीसद नमूनों में पोटेशियम ब्रोमेट और पोटेशियम आयोडेट मिले हैं, जिसके लगातार सेवन से कैंसर और थायराइड जैसी बीमारियां हो सकती हैं। अगर सीएसई की जांच और उसके नतीजे सही हैं तो सवाल है कि इतने सालों से व्यापक पैमाने पर जितने लोग ब्रेड खा रहे हैं, अगर उन्हें इसी वजह से कोई गंभीर बीमारी हुई होगी तो उसके लिए कौन जिम्मेवार होगा! यहां सवाल उठता है कि आखिर खाद्य पदार्थों पर निगरानी करने वाला सरकारी तंत्र मिलावट पर नकेल कसने में नाकाम क्यों साबित हो रहा है। नमूने लिए जाते हैं और रिपोर्ट भी सौंप दी जाती है लकिन उसके बाद क्या होता है यह पता नहीं चल पाता। पिछले साल मैगी के मसले पर उठे हंगामे का हासिल क्या हुआ, यह सभी जानते हैं। कई साल पहले सीएसई ने ही कोका कोला और पेप्सी कोला जैसे ठंडे पेयों में कीटनाशकों की मात्रा और उसकी वजह से होने वाली बीमारियों के बारे में एक अध्ययन जारी किया था। बाद में संसदीय समिति ने भी उन निष्कर्षों सही बताया। लेकिन घोर चिंताजनक निष्कर्षों के बावजूद क्या कार्रवाई हुई, सभी जानते हैं। जबकि रोजाना की खाने-पीने की चीजों को लेकर सरकार को खुद अपनी ओर से सचेत रहना चाहिए।

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