स्वास्थ्य के मामले में गंभीर नहीं राज्य सरकारें

शहरी इलाकों में बड़ी मात्रा में ऐसे दूध की बिक्री होती है जो यूरिया, डिटर्जेंट, कॉस्टिक सोडा, सफेद पेंट, रंग आदि के जरिये दूध तैयार किया जाता है। गाहे-बगाहे छापा पड़ता है तो इनकी पोल खुलती है। कार्रवाई क्या होती है यह तो जिम्मेदार ही जानते हैं।

sanjay sharma editor5पहले अमूल और अब मदर डेयरी के दूध में गड़बड़ी पाई गई है। जब बड़ी-बड़ी कंपनियों के उत्पाद में ऐसी गड़बडिय़ां मिल रही हैं तो स्थानीय कंपनियों की बात ही अलग है। एक समय था कि दूध में पानी की मिलावट को ही समस्या के तौर पर देखा जाता था, लेकिन कुछ वर्षों में पानी की जगह केमिकल ने ले ली है।
ऐसा नहीं है कि दूध में मिलावट पहली बार पता चली है। नमूने लिए जाते हैं और यह भी बता दिया जाता है कि नमूने फेल हैं, पर कार्रवाई क्या होती है यह किसी को नहीं पता चलता। दो-चार दिन हलचल मचती है, लेकिन कुछ ही समय बाद सब कुछ पहले की तरह हो जाता है।
यह तो हो गई पैकेट वाले दूध की बात। शहरी इलाकों में बड़ी मात्रा में ऐसे दूध की बिक्री होती है जो यूरिया, डिटर्जेंट, कॉस्टिक सोडा, सफेद पेंट, रंग आदि के जरिये दूध तैयार किया जाता है। गाहे-बगाहे छापा पड़ता है तो इनकी पोल खुलती है। कार्रवाई क्या होती है यह तो जिम्मेदार ही जानते हैं। जहर सरीखे दूध की धड़ल्ले से बिक्री होती है, इससे हर कोई परिचित है। राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार। और तो और सुप्रीम कोर्ट भी यह जानता है। सुप्रीम कोर्ट तो कई बार केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक को मिलावटी दूध की बिक्री को लेकर फटकार लगा चुका है, फिर भी राज्य सरकारें इस मामले को लेकर गंभीर नहीं हैं, जबकि दूध में मिलावट रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है।
अब तो यह भी देखने में आ रहा है जब किसी मामले का संज्ञान सुप्रीम कोर्ट ले लेता है तो राज्य सरकारें उसके आदेश-निर्देश की मोहताज होकर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाती हैं। आखिर राज्य सरकारों को अपने स्तर पर यह क्यों नहीं समझ आता कि मिलावटी दूध के मामले में उनकी ढिलाई लोगों की सेहत के लिए खतरा बन गई है? दूध में मिलावट की समस्या अब हानिकारक तत्वों से तैयार नकली दूध में तब्दील हो गई है। कई जगहों पर तो नकली दूध के कारोबार ने कुटीर उद्योग जैसा रूप धारण कर लिया है। क्या सुप्रीम कोर्ट फटकार नहीं लगाएगा तो राज्य सरकारें मिलावटी दूध को रोकने के लिए कुछ नहीं करेंगी?
होना तो यह चाहिये कि सरकारें ईमानदारी से समय-समय पर इसकी जांच करवायें और दोषी पाये जाने पर उचित कार्रवाई करें। अगर ऐसा नहीं होता है तो ऐसे ही आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होता रहेगा जिसका परिणाम सरकारों को भी भुगतना पड़ेगा।

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