स्वच्छता सर्वेक्षण और कूड़े से पटी गलियां

अहम सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में भी नगर निगम की लापरवाही के कारण जनता को ऐसी ही समस्याओं से दो चार होना पड़ेगा? क्या आगे भी नगर निगम की कमियों का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ेगा? क्या इन्हीं मंसूबों की बदौलत शहर को स्मार्ट बनाया जायेगा? क्या स्मार्ट सिटी बनने के बाद भी लखनऊ के लोगों को ऐसी समस्याओं को झेलना पड़ेगा?

sajnaysharmaस्वच्छ भारत मिशन के तहत शहरों में स्वच्छता का सर्वेक्षण किया जा रहा है। केन्द्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय की टीम स्वच्छ भारत मिशन की हालिया स्थिति का आंकलन करने के लिए लखनऊ के अलग-अलग क्षेत्रों में सफाई व्यवस्था का निरीक्षण कर रही है। लेकिन शहर के अधिकांश मोहल्लों की गलियां कूड़ों से पटी पड़ी हैं। कूड़ा उठान का काम काफी समय से नहीं हो पा रहा है। इसलिए मुंह पर रुमाल रखकर गलियों से गुजरना लोगों की आदत में शामिल हो चुका है। जिन्हें अपने घर, गली और मोहल्ले में कूड़े-कचरे का ढेर लगने से समस्या हो रही है, उन्होंने कूड़ा उठाने वाले प्राइवेट व्यक्तियों या एजेंसियों से संपर्क करना शुरू कर दिया है। ये प्राइवेट कर्मचारी प्रति मकान 50 रुपये लेकर कूड़ा उठाने का काम करने लगे हैं। लेकिन ऐसा तब हो रहा है, जब राजधानी की जनता अपने शहर को जल्द से जल्द स्मार्ट बनने की उम्मीद लगाये बैठी है। क्या आने वाले दिनों में भी नगर निगम की लापरवाही के कारण जनता को ऐसी ही समस्याओं से दो चार होना पड़ेगा ? क्या आगे भी नगर निगम की कमियों का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ेगा ? क्या इन्हीं मंसूबों की बदौलत शहर को स्मार्ट बनाया जायेगा ? क्या स्मार्ट सिटी बनने के बाद भी लखनऊ के लोगों को ऐसी समस्याओं को झेलना पड़ेगा ? ऐसे तमाम सवाल हैं, जिनके जवाब देने में नगर निगम के अधिकारी नाकाम साबित हो रहे हैं। ऐसे में स्मार्ट बनने की ख्वाहिशों पर आशंका के बादल मंडराने लगे हैं।
2011 के सर्वे के अनुसार लखनऊ में लगभग 44 हजार घर ऐसे हैं, जिनमें शौचालय नहीं है। इस साल निगम ने केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही स्कीम के तहत लगभग एक हजार शौचालय बनवाए हैं। वहीं कूड़ा निस्तारण और शिवरी प्लांट ठप पड़ा है। अब ऐसे में 2000 अंकों के स्वच्छता सर्वेक्षण में लखनऊ को कितने अंक मिलेंगे। इस बात का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है, क्योंकि यहां कर्मचारी की अटेंडेंस मैनुअल तरीके से ली जाती है। कर्मचारी ड्यूटी से अनुपस्थित रहते हैं। काम समय से पूरे नहीं होते हैं। कूड़ा उठान ठप है। इसके अलावा स्वच्छ पेयजल, बारिश में जलभराव, सफाई कर्मियों की कमी और कार्यालयों में काम के समय में टाइम पास की समस्या भी विकट है। यदि हमें अपने शहर को वाकई स्मार्ट बनाने है, तो सरकारी विभागों को अपना काम ईमानदारी से करना होगा। जनता को अपने अधिकारों की नहीं कर्तव्यों को भी समझना होगा, तभी रियल में हम और हमारा शहर स्मार्ट बन पायेगा।

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