स्कूल के कमरे बने गोदाम, खुले मैदान में पढऩे को मजबूर छात्र

रवि·ांत उपाध्याय गंजबासौदा,

प्राथमिक विद्यालय में दस कमरे लेकिन छात्रों को बैठना पड़ता है मैदान में
स्कूल की प्रिसिंपल और वार्डेन की लापरवाही के चलते है भवन पर कब्जा

 हिना खान
Captureलखनऊ। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक का एक ही नारा है सर्व शिक्षा अभियान के तहत अधिक से अधिक बच्चों को स्कूल से जोड़े और उन्हें शिक्षित करें। इस अभियान के तहत बच्चों को उनकी जरुरत के अनुसार सारी सुविधाएं देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च भी किये जातें हैं। निराला नगर में भी इसी उद्देश्य से एक प्राथमिक विद्यालय के भवन का निर्माण कराया गया था, लेकिन वहां छात्रों के लिए बनाएं गये कमरों में किताब का गोदाम बनाकर ताला लगा दिया गया है। स्थिति यह है कि यहां पढऩे वाले बच्चे खुले मैदान में बैठकर पढ़ाई करते हैं। खुले मैदान में एक दरी और एक ब्लैक बोर्ड ही सहारा है। यहां के प्रिंसिपल को बच्चों की जरुरत से कोई मतलब नहीं है। प्रिंसिपल और वार्डेन की मिलीभगत के चलते बच्चों को इस स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
निराला नगर स्थित प्राथमिक विद्यालय में लगभग 10 कमरे हैं, लेकिन बच्चों के पढऩे के लिए एक भी कमरा खाली नहीं हैं। मजबूरन छात्र इस ठंड में बाहर पढऩे को मजबूर हैं। विद्यालय प्रशासन ने तीन कमरों में किताब के गोदाम के बहाने से ताला लगा रखा है, जबकि जुलाई माह में ही किताबों का वितरण का कार्य हो जाता है। इस विद्यालय में कक्षा एक से लेकर कक्षा पांच तक कुल मिलाकर 135 छात्र अध्यनरत हैं। ये सभी छात्र अगल-बगल खुले मैदान में बैठते है। ऐसे में सवाल उठता है कि इन छात्रों के कैसे पढ़ाया जाता होगा। इस बात की सूचना विद्यालय की शिक्षिकाओं ने प्रिंसिपल को भी कई बार दी लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

कमरों में हैण्डी क्रॉफ्ट कक्षा चलाने वालों का है कब्जा

बीएसए ने तीन कमरों में हैण्डी क्रॉफ्ट बच्चों की कक्षाएं चलाने के निर्देश दिए थे। हालात यह है कि इन लोगों ने पांच कमरों पर कब्जा कर रखा है। इसके अलावा अन्य दो कमरों मे रिसोर्स कैंप लगा रखा है। जबकि इन लोगों के लिए चिनहट के एक स्कूल में कमरा दिया गया हैं। अन्य कमरों में कैंटीन और वहां की देखभाल करने वालों ने अपनी आरामगाह में तब्दील कर रखा है। यह बच्चे ठंड में किसी तरह पढ़ाई करते हैं लेकिन बारिश और गर्मी से बचने के लिए बच्चों को विद्यालय के कॉलीडोर में एक छोटी सी जगह मे ही सिर छिपाना पड़ता है।

मदद के लिए आते हैं कई सामाजिक संगठन

शिक्षिकाओं का कहना है कि यहां पर कई सामाजिक संगठन आते हैं। उनमें से कुछ ने बच्चों के लिए टेबल-कुर्सी बनवाकर देने की बात की है, लेकिन हम फर्नीचर का क्या करेंगे जब हमारे पास उसे रखने की जगह ही नहीं है। इस बात की जानकारी कई बार मेयर साहब को पत्र लिख कर दी है लेकिन उधर से कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

टीचर हैं परेशान

विद्यालय की इस व्यवस्था से टीचर परेशान हैं, क्योंकि विद्यालय में पढ़ाने के बजाय शिक्षकों का पूरा समय बच्चों को शांत कराने व उन्हें किसी घटना से बचाने में ही निकल जाता है। शिक्षकों का कहना है कि हमें जो बच्चों को पढ़ाना व समझाना होता है वह नहीं कर पाते क्योंकि बच्चे एकाग्र नहीं हो पाते हैं।

वार्डेन और ङ्क्षप्रसिपल की मिली भगत

प्रिंसिपल बच्चों की ऐसी हालत को देखते हुए भी खामोश हैं। वहीं वार्डेन ने एक-एक कर पांचों कमरों में कब्जा कर रखा है। शिक्षकों के कहने पर भी प्रिंसिपल ने वार्डेन से किसी तरह का जवाब-तलब नहीं किया गया। प्रिंसिपल के इस व्यवहार पर सवाल उठना लाजमी है कि अखिर इस दोहरे व्यवहार के पीछे प्रिंसिपल का कोई स्वार्थ तो नहीं छिपा है। इस संबंध बेसिक शिक्षा अधिकारी से सवाल करने पर उन्होंने कहा कि मुझे इस बात की कोई जानकारी नही है और न ही कोई शिकायत मेरे पास आई है। इस बात का संज्ञान लेने के लिए उन्होंने विद्यालय में फोन कर प्रिंसिपल और वार्डेन को फटकार लगाई।

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