स्कूलों, कॉलेजों में वीर सैनिकों के चित्र लगाने की शुरुआत हो

 तरुण विजय

देश पर विपदा आए और हम अलग-अलग आवाजों में बात करें तो इससे मजबूत कौन होगा? क्या हमारे राजनीतिक लाभ, विचारधारा का महत्व, व्यक्तिगत नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं देश से बड़ी हो सकती हैं? हम भूल गए कि इतिहास के कालक्रम में सत्तर साल एक बूंद से भी कम होते हैं और हमारे पिता, पितामह की आंखों के सामने देश विभाजित हुआ था और लाखों लोग मारे गए थे। सिर्फ इसलिए कि हम एकता बना नहीं सके और एक खून, एक नस्ल, एक भाषा, एक पुरखे होने के बावजूद साम्प्रदायिक उन्माद ने देश बांटा ही नहीं बल्कि नए शत्रु पैदा कर दिए।
कश्मीर जाता है तो किसकी क्षति है? और कश्मीर में आतंकवादियों का निर्मूलन होता है तो किसकी उपलब्धि होती है? वह जो सैनिक ऋण 40 तापमान में सियाचिन पर और अड़तालिस डिग्री के उबलते अंधड़ों में जैसलमेर में खड़ा रहता है, जो केरल कर्नाटक या नगालैंड, अरुणाचल से हो या यादव, ठाकुर, महार, वैश्य है, जिसके माता-पिता, बच्चे, पत्नी, बहनें वैसी ही आत्मीय और लाड़ प्यार से भरी होती हैं जैसी हमारी बहनें हैं, वह जब सीमा पर लड़ता है, शत्रु मारता है, अपना बलिदान देता है तो किसका मन अभिमान, मौन श्रद्धांजलि और बिछुडऩे के अवसाद से भर उठता है?
अगर ऐसा होता है तब भी आप और हम भारतीय हैं… वरना पासपोर्ट धारी इंडियन और पासपोर्ट धारी अमेरिकी में कोई फर्क ही क्या है? हम प्राय: देशभक्ति टीवी के पर्दे के क्षणिक अतिरेकी उत्साह में लिपटती देखते हैं। शहीद सैनिक की देह जिस गांव, शहर में आती है वहां के प्रमुख लोग व्यस्त रहते हैं। शहर के स्कूल सम्मान में उस शहीद की जीवनकथा बच्चों को विशेष रूप से सुनाकर श्रद्धांजलि देते नहीं दिखते। बच्चों को शहीद-प्रणाम के लिए पंक्तिबद्ध खड़ा कर पार्थिव देह ले जाए जाते समय सम्मान करना सिखाया नहीं जाता। प्रदेश सरकारें अपने राज्यों के पाठ्यक्रमों में स्थानीय सैनिक शहीदों की वीरगाथाएं, परमवीर चक्र विजेताओं के शौर्य भरे कारनामे किसी भी कक्षा में अतिरिक्त पठन सामग्री के नाते भी शामिल करती नहीं। फिर भी हम शहीदों के संदर्भ में शोर मचाना, वितण्डा खड़ा करना, अखबारों में ऐसे बयान देना कि मेरा स्वदेशी नेता तो आहत हो ही, मैं शत्रु देश में भी स्वदेश के खिलाफ ‘प्रमाण’ बन जाऊं, यह सब चलता रहता है।
हमसे बाद में जो देश स्वतंत्र हुए वे सकल घरेलू उत्पाद, प्रति व्यक्ति समृद्धि, शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य के मानकों पर हमसे कई गुना आगे बढ़ गए। महान संस्कृति, सभ्यता और लोकतंत्र को प्रचारित करते करते भी हम न तो स्त्री स्वतंत्रता और सशक्तिकरण में आगे बढ़े, न हमारे विश्वविद्यालय विश्व स्तर पर प्रथम सौ में आ पाए, न हम शोध और क्रीड़ा में कुछ ऐसा कर पाए कि विश्व शक्ति के नाते हमारी धाक जमे। फुटपाथ पर जिंदगियां सिसकती हैं- चालीस प्रतिशत लोग दो जून का भरपेट खाना नहीं खा पाते, अनुसूचित जातियों और अमानुषिक जुल्मों की खबरें हर दिन छपती हैं… फिर भी हम मुहल्लाछाप राजनीति में जीवन का उद्ïदेश्य केवल प्रतिपक्षी को अपमानित करना ही मान बैठे हैं।
क्या कभी देखा है कि कोई मुख्यमंत्री या मंत्री कभी किसी विश्वविद्यालय के अध्यापकों, छात्रों से आडम्बरहीन सहज चर्चा के लिए चला आता हो? और पूछे कि क्या आपकी किसी समस्या का मैं समाधान कर सकता हूं। क्या किसी नेता को बाजार में पत्नी के साथ सब्जी, कपड़ा खरीदने या यूं ही बच्चों को घुमाने जाते देखा है? इन लोगों को अपने बड़े होने का अहंकार इतना ज्यादा होता है कि शर्म से जीवन में गड़ जाएंगे लेकिन बाजार में आम नागरिक की तरह खुद अपनी निजी कार चलाते हुए परिवार के साथ दिखना पसंद नहीं करेंगे।
ऐसे लोग- देश की सुरक्षा, सैनिकों के सामान, हथियारों की बेहतर खरीदें, आतंकवाद के अंत जैसे विषयों पर एकजुटता दिखाते हुए, देश का हौसला कैसे बढ़ाएंगे? क्या इनसे सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि सुरक्षा कर्मियों के घेरे में समाज से कई मंजिल ऊंचे मंचों से नागरिकों को चींटी के मानिंद देखते हुए जरा बताइए तो हुजूर कि भारत जीतता है तो हारता है कौन, और भारत को चोट लगती है तो कराहता है कौन?
भारत चारों ओर जिन शक्तियों से घिरा है वे निश्चय ही हमारी प्रगति और विकास नहीं चाहेंगे। यदि अब तक खबर से हम पर हमले होते रहे तो भविष्य की सबसे बड़ी सामरिक चुनौतियां सागर क्षेत्र से आने वाली हैं। भारत की साढ़े सात हजार किलोमीटर लंबी सागर-सीमा और लगभग इतनी ही जमीनी-पहाड़ी सरहद हमारे सामने राष्ट्रीय एकता और एकजुटता के अलावा और कोई विकल्प छोड़ती ही नहीं। भीतर से नक्सली और माओवादी, बाहर से पाकिस्तान तथा चीन की चुनौतियों के साथ-साथ जिहादी और आईएस, बाहर से पाकिस्तान तथा चीन की चुनौतियों के साथ-साथ जिहादी और आईएस के प्रहार एक ऐसे भारत की मांग करते हैं जो विभिन्न राजनीतिक कार्यक्रमों पर चाहे जितने ही मतभेद रखें लेकिन सुरक्षा और आतंकवाद पर सर्वसम्मति। इसके लिए सेना और सैनिकों का सम्मान हमारे हृदय में, वाणी में सर्वोपरि होना चाहिए। क्या हम प्रत्येक विद्यालय और विश्वविद्यालय में कम से कम परमीवर चक्र विजेता, वीर सैनिकों के चित्र लगाने से शुरूआत कर सकते हैं? नेताओं के चित्र भले ही हटा दें पर सैनिकों के चित्र लगाने ही चाहिए।
जिस देश में सैनिकों का सम्मान होता है उसका भविष्य भी सुरक्षित रहता है। जहां सैनिकों को आम कर्मचारियों की तरह वेतनभोगी मान लिया जाता है, जहां नागरिक सेवाओं में तैनात अधिकारियों के रूतबे और वेतन तथा अन्य सुविधाएं सैनिक अधिकारियों से ज्यादा हो जाती हैं, जहां समाज और राजनीति में सैनिक सबके समान सम्मान का अधिकारी नहीं होता, उसका भविष्य वैसा ही होता है जैसा हमने तक्षशिला और नालंदा का देखा या रावलपिंडी और कराची को अपने हाथों से फिसलते जाते देखा। बुद्धिजीवियों द्वारा देश को दिशा अवश्य मिलती है लेकिन अगर बुद्धिजीवियों के स्थान पर बुद्धिराक्षसों को देश की रीढ़ कमजोर करने वाला वातावरण बनाया जाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि इनको परास्त पहले करना होगा, सरहद पार के शत्रु को परास्त करना तो अधिक सरल है।

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