सोशल मीडिया में ही निहित है दुरुपयोग रोकने का रास्ता

आखिरकार सरकारें और प्रशासन सोशल मीडिया की अपरिमित शक्तियों का प्रयोग उसके प्रयोक्ताओं के साथ विश्वास और सद्भाव का वातावरण निर्मित करने में क्यों नहीं कर सकतीं? वे इस मीडिया की शक्तियों का शांति, सद्भाव और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए क्यों नहीं करतीं- ठीक उसी तरह जैसे नकारात्मक तत्व उसका प्रयोग नकारात्मक उद्देश्यों के लिए करते हैं। सोशल मीडिया खुद अपने बारे में जागरूकता फैलाने का अच्छा माध्यम बन सकता है।

 बालेन्दु शर्मा दाधीच
सोशल मीडिया की अपरिमित शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने का रास्ता सोशल मीडिया के भीतर से ही आता है। गूगल के चेयरमैन एरिक श्मिट ने कुछ समय पहले कहा था- ‘हम (गूगल) जानते हैं कि आप कहां पर हैं, हम जानते हैं कि आप कहां जाकर आए हैं और हम यह भी थोड़ा-बहुत जानते हैं कि आपके दिमाग में क्या चल रहा है।’ आज दुनिया में ‘बिग डेटा’ जैसी तकनीकों का दौर है जो करोड़ों लोगों के भूत-भविष्य और वर्तमान को खंगालने की स्वचालित व्यवस्थाओं को जन्म दे रहा है। तकनीकी विश्व में इस संभावना का आकलन किया जा रहा है कि क्या सोशल मीडिया के भीतर ऐसा स्वचालित तंत्र कायम किया जा सकता है जो सामाजिक अशांति पैदा होने के बारे में पहले से चेतावनी दे सके! सरकारों को गूगल और फेसबुक जैसी तकनीकी कंपनियों को साथ लेकर इस दिशा में काम करने की जरूरत है।
आखिरकार सरकारें और प्रशासन सोशल मीडिया की अपरिमित शक्तियों का प्रयोग उसके प्रयोक्ताओं के साथ विश्वास और सद्भाव का वातावरण निर्मित करने में क्यों नहीं कर सकतीं? वे इस मीडिया की शक्तियों का शांति, सद्भाव और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए क्यों नहीं करतीं- ठीक उसी तरह जैसे नकारात्मक तत्व उसका प्रयोग नकारात्मक उद्देश्यों के लिए करते हैं। सोशल मीडिया खुद अपने बारे में जागरूकता फैलाने का अच्छा माध्यम बन सकता है। आखिर क्यों हमारा प्रशासन और सरकारें दुष्प्रचार का जवाब देने में तेजी नहीं दिखातीं? आखिर क्यों वे इसी माध्यम का प्रयोग अफवाहों के त्वरित खंडन और दुष्प्रचार के शमन हेतु नहीं करतीं? आखिर क्यों वे इस माध्यम पर चल रही वैचारिक धारा को पहचानने में इतनी देरी कर देती हैं कि तब तक नुकसान हो चुका होता है!
दादरी और उसके जैसी अन्य घटनाएं दिखाती हैं कि आज हमारा समाज तथ्यों का पता लगाने के प्रति उतना अधिक लापरवाह हो गया है, जितना शायद पहले कभी नहीं रहा। सामान्य प्रयोक्ताओं के बीच जागरूकता फैलाना उसके विवेकपूर्ण प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक है। इंटरनेट को जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करना अपने आपमें एक कौशल है। आज हम इंटरनेट का सिर्फ प्रयोग कर रहे हैं लेकिन उसके विवेकपूर्ण प्रयोग के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। यह संयोग है कि हमें बहुत अधिक नुकसान नहीं झेलना पड़ा है लेकिन किसी शक्तिशाली चीज का प्रयोग करने के लिए विवेक, बुद्धिमत्ता और नियंत्रण से काम लेना एक स्वाभाविक आवश्यकता है। हम अपने नागरिकों को उस किस्म की जिम्मेदारी की भावना से लैस नहीं कर रहे जिसकी जरूरत है। यह उसी तरह है जैसे वाहन चलाना। आप अच्छी तरह सीखने, नियमों को जानने और अपने वाहन की क्षमताओं तथा कमियों को भली प्रकार पहचानने के बाद ही विधिवत लाइसेंस लेकर सडक़ पर निकलते हैं क्योंकि वाहन के भीतर मौजूद शक्ति का यदि अनियंत्रित या अविवेकपूर्ण ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो वह दूसरों के लिए प्राणघातक हो सकती है।
सोशल मीडिया के नागरिकों के बीच भी उत्तरदायित्व की भावना होनी चाहिए। अगर वह नहीं है तो पैदा किए जाने की जरूरत है और यह काम सरकारों, इंटरनेट सेवा प्रदाताओं, शिक्षण संस्थानों और दूरसंचार कंपनियों को संभालना चाहिए। दूसरी जरूरत है एक ऐसी व्यवस्था की जो इस मीडिया का नकारात्मक प्रयोग करने पर कानूनी ढंग से अंकुश लगा सके, अर्थात् हमारे कानूनों में सोशल मीडिया जन्य अपराधों पर कड़ी कार्रवाई करने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। जब आपराधिक कार्रवाई की बात आती है तो संबंधित व्यक्ति की पहचान अत्यंत आवश्यक हो जाती है। इंटरनेट पर किसी एक व्यक्ति को पहचानना तो आसान है लेकिन भीड़ की स्थिति में जिस तरह आम जनजीवन में पुलिस और प्रशासन बेबस दिखाई देते हैं उसी तरह सोशल मीडिया पर भी जब लाखों लोग जुट जाएं तो यह आसान काम मुश्किल हो जाता है। बड़ी संख्या में लोग साथ आ जाएं तो उनके विरुद्ध कार्रवाई करना व्यावहारिक नहीं रह जाता और उसके संभावित नतीजे सरकारों को सामूहिक रूप से दंडात्मक कार्रवाई करने से रोक देते हैं।
अंत में एक सवाल कि क्या हम लोकतंत्र, इंटरनेट की मुक्त प्रकृति और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ऐसी तमाम नकारात्मक घटनाओं को अनदेखा करने का जोखिम मोल ले सकते हैं जो सोशल मीडिया का निर्बाध और अविवेकपूर्ण इस्तेमाल से पैदा हो रही हैं?

Pin It