सोशल मीडिया प्रकृति से ही स्वच्छंद और अनियंत्रित है

बालेन्दु शर्मा दाधीच
सोशल मीडिया की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में एक दिलचस्प उदाहरण याद आता है। अल्फ्रेड नोबेल ने डायनामाइट का आविष्कार किया था, इस उद्देश्य के साथ कि यह धरती पर विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। वह खदानें खोदने, पत्थर तोडऩे और खंडहरों को गिराने के काम आएगा। वह पहाड़ों को तोडक़र रास्ते बनाने में मदद करेगा। नोबेल का यह भी मानना था कि डायनामाइट की मौजूदगी युद्धों को टालने का कार्य करेगी। सरकारें एक-दूसरे के खिलाफ हिंसक कार्रवाई करने से बचेंगी। डायनामाइट ने इन कार्यों में मदद की भी, लेकिन मानवता के लाभार्थ उसका जितना उपयोग हुआ, उतना ही दुरुपयोग भी मानवता के विध्वंस के लिए ही हुआ। एल्फ्रेड नोबेल, जिन्होंने बाद में संभवत: इस घातक आविष्कार से हुए नुकसान की ग्लानि को मिटाने के उद्देश्य से शांति का नोबेल पुरस्कार शुरू किया, बाद में पछताए थे कि उन्होंने यह आविष्कार क्यों कर दिया। एके 47 राइफल का विकास करने वाले मिखाइल कालाश्निकोव भी इसी तरह पछताए थे। आप जानते हैं कि आज पुलिस और सेनाओं के साथ-साथ दुर्दांत अपराधी और आतंकवादी भी इसी राइफल का इस्तेमाल करते हैं।
दुर्भाग्य से इन तकनीकों की ही तरह सोशल मीडिया भी दोधारी तलवार की तरह देखा जा रहा है। हालांकि ऐसी घटनाओं के लिए वास्तविक रूप से जिम्मेदार हमारी मानसिकता है लेकिन सोशल मीडिया उस वाहन का कार्य करता है जिस पर सवार होकर यह मानसिकता एक से दस, दस से सौ और सौ से हजार लोगों को साथ जुटा लेती है। वह उसी तरह का माध्यम है जैसे कि एक टेलीफोन। आप इसका प्रयोग किसी को इंटरव्यू में सफल होने की खबर सुनाने के लिए भी कर सकते हैं और किसी के बारे में अफवाह फैलाने के लिए भी। वह एक माध्यम भर है।
लेकिन यह भी सच है कि इस माध्यम के भीतर ऐसा कोई तंत्र या प्रणाली अंतरनिहित नहीं है जो उसे अनुशासन या शालीनता के दायरे में बांधे रख सके। उसके भीतर नैतिक नियंत्रण की कोई व्यवस्था है ही नहीं। या तो सोशल मीडिया को पूरी तरह रोका जा सकता है (जैसे हाल ही में कश्मीर में प्रदर्शनों व हिंसा को रोकने के लिए और गुजरात में पटेल आंदोलन के दौरान हालात नियंत्रण में रखने के लिए किया गया) या फिर पूरी तरह छूट दी जा सकती है। तकनीकी माध्यमों से सोशल मीडिया की फिल्टरिंग संभव है लेकिन वह इंटरनेट की मुक्त प्रकृति के अनुकूल नहीं है। वह हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों को भी आघात पहुंचाता है। ऐसी स्थिति में वह उन सकारात्मक कार्यों के लिए भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा जो सत्ताधारियों के खिलाफ हैं। ऐसे में किया जाए तो क्या किया जाए?
सरकारी तंत्र की समझ
एक सवाल तो यही पैदा होता है कि क्या हमारी सरकारें और सुरक्षा एजेंसियों को सोशल मीडिया की समझ है? आपको याद होगा कि पिछली सरकार के दौर में तत्कालीन सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने प्रस्ताव किया था कि सभी सोशल नेटवर्किंग, ब्लॉगिंग और माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइटों को अपने यहां प्रयोक्ताओं की तरफ से डाली जाने वाली तमाम सामग्री को पहले जांचना-परखना होगा और यह तसल्ली हो जाने पर ही इंटरनेट पर डालने देना होगा कि वह सामाजिक दृष्टि से सुरक्षित है। क्या इस तरह की विषय-वस्तु (हर टिप्पणी, हर चित्र, हर वीडियो, हर ब्लॉग पोस्ट आदि) को मैनुअली (इंसानी माध्यम से) खंगालना व्यावहारिक दृष्टि से संभव है? फेसबुक पर हर मिनट में करीब 4 चाख टिप्पणियां की जा रही हैं और ट्विटर पर भी लगभग यही स्थिति है। व्हाट्सऐप पर तो और भी अधिक सामग्री पोस्ट हो रही है। यू-ट्यूब भी पीछे नहीं है। क्या आप इंसानों का ऐसा कोई मैकेनिज्म तैयार कर सकते हैं जो हर मिनट में यही कोई बीसेक लाख टिप्पणियों को पढ़ सकें और तय कर सकें कि उन्हें इंटरनेट पर जाना चाहिए या नहीं? यदि इस काम में बीस लाख लोग भी लगाए जाएं तब भी वे एक मिनट में एक टिप्पणी को पढऩे और मंजूरी देने का काम मशीनों की तरह चौबीसों घंटे नहीं कर सकते।
सोशल मीडिया को सामाजिक तनाव, अशांति, विवादों, हिंसा और प्रदर्शनों का साधन बना लिए जाने पर सरकारों की चिंता जायज है लेकिन इसका परिमाण इतना बड़ा है कि उसे बांधने की कोशिश सुनामी की लहरों को रोककर बांध बनाने की कोशिश के समान है।
इंटरनेट की प्रकृति तीव्र और त्वरित परिणाम देने की है। वह किसी भी व्यक्ति को चुपके से तीली लगाकर निकल जाने का मौका भी देती है। बाद में जब लाखों की भीड़ आ जुटती है तो उसे पहचानना और ढूंढ निकालना लगभग असंभव हो जाता है। खासकर उस स्थिति में जब वह व्यक्ति अपनी विध्वंसक टिप्पणी को हटाने की आजादी भी रखता है।

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