सोवियत संघ के विघटन के लिए दोषी कौन?

असली धमाका तो राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के उस बयान ने किया जब उन्होंने अखंड रूस के विघटन के लिए सोवियत संघ के संस्थापक, क्रांतिकारी नेता ब्लादिमीर इलिच लेनिन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने लेनिन पर अखंड रूस की इमारत की नींव तले एटम बम रखने का आरोप लगाया, जिसके फलस्वरूप कालांतर में सोवियत संघ का विघटन हो गया।

विनय शुक्ला
इस साल के दिसंबर में यूएसएसआर यानी सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ के विघटन को पूरे 25 साल हो जायेंगे। जैसे-जैसे यह तिथि पास आती जा रही है, रूसी समाज का परम्परागत सवाल ‘कौन दोषी?’ फिर से बड़े जोर-शोर से गूंज रहा है। हरेक अपनी सामाजिक और राजनीतिक हैसियत के अनुसार इस बहस में भाग ले रहा है।
1990 के दशक की तरह अब अमेरिकी सीआईए पर दुनिया की दूसरी महाशक्ति को तोडऩे का कोई सीधा आरोप नहीं लगाया जा रहा है, बहस इसमें रूस के नेताओं की भूमिका के बारे में है। शुरुआत प्रसिद्ध सिनेकार निकीता मिखाल्कोव ने की जब उन्होंने इस साल के शुरू में सोवियत संघ के विघटन के लिए अंतिम सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव और प्रथम रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन की नीतियों को जिम्मेदार बताया और उन्हें सरकारी स्तर पर अपराधी करार करने की आवश्यकता पर बल दिया।
असली धमाका तो राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के उस बयान ने किया जब उन्होंने अखंड रूस के विघटन के लिए सोवियत संघ के संस्थापक, क्रांतिकारी नेता ब्लादिमीर इलिच लेनिन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने लेनिन पर अखंड रूस की इमारत की नींव तले एटम बम रखने का आरोप लगाया, जिसके फलस्वरूप कालांतर में सोवियत संघ का विघटन हो गया। पुतिन ने कहा कि रूस को किसी भी क्रांति की जरूरत नहीं थी। कुछ भी हो, अनेक मजदूरों, किसानों के बेटे-बेटियों की तरह एक बावर्ची का बेटा व्लादिमीर पुतिन भी इस क्रान्ति की बदौलत ही शायद देश में इतने ऊंचे ओहदे तक पहुंच पाया। वैसे तो भारत जैसे देश में भी जहां कोई समाजवादी क्रांति नहीं हुई, एक चायवाला भी देश का प्रधानमंत्री बन सका।
लेनिन के खिलाफ अपने आरोप की व्याख्या करते हुए पुतिन ने समझाया कि 1922 में सोवियत संघ की स्थापना के समय स्तालिन उसमें शामिल गणराज्यों को यथासंभव स्वायत्तता देने के पक्ष में थे परन्तु सोवियत संघ से निकलने के अधिकार के खिलाफ थे, जबकि लेनिन ने उन्हें पूर्ण स्वाधीनता और सोवियत संघ से निकलने का अधिकार दिए जाने की बात को मनवा लिया। ‘यही वह एटम बम था जो 1991 में जा फटा और सोवियत संघ बिखर गया?’ पुतिन ने समझाया। पुतिन जो एक रूसी राष्ट्रवादी हैं, भलीभांति समझते हैं कि सोवियत संघ बीसवीं सदी में रूसी साम्राज्य का एक आधुनिक रूप था और उसकी अखंडता को सुरक्षित रखता था। परन्तु उसके विघटन के साथ-साथ रूस के अनेक मूल हिस्से पड़ोसी, नवस्वाधीन देशों को चले गए, उदाहरण के लिए क्रीमिया के मामले को ही लें।
खैर इसे छोड़ें, हम तो दोषी की तलाश में हैं। स्वाभाविक है कि रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गेन्नादी ज्युगानोव ने इस विवाद में लेनिन की हिमायत की और सोवियत संघ के विघटन के लिए सारा दोष सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति के प्रथम सचिव व देश के प्रधानमंत्री निकीता ख्रुश्चेव के सिर मढ़ दिया।
‘ख्रुश्चेव ने लेनिन और स्तालिन द्वारा किये गए आधुनिकीकरण को कलंकित करने की कोशिश की जोकि जन-जनार्दन के समक्ष एक अपराध था।’ ज्युगानोव ने कहा, जिनका तात्पर्य 15 फरवरी 1956 को सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस में दिए गए भाषण में ख्रुश्चेव द्वारा स्तालिन के अत्याचारों का पर्दाफाश किये जाने से था।
ज्युगानोव का मत है कि तभी देश में फूट पडऩी शुरु हो गयी, जिसके परिणामस्वरूप अंतत: ‘एक महाशक्ति का पतन’ हो गया। फिर भी उन्होंने देश के ‘पूंजीपति मंत्रियों’ याद दिलाया कि आज के तेल और प्राकृतिक गैस समुच्चय, देश की परमाणु क्षमता और अन्तरिक्ष की उपलब्धियां सिर्फ सोवियत सत्ता, लेनिन-स्तालिन के औद्योगिकीकरण का ही परिणाम हैं।
सितम्बर में देश की संसद के निचले सदन- राजकीय दूमा के चुनावों के मद्देनजर यह राजनीतिक बहस और भी उग्र होती जा रही है, खास तौर से पश्चिम के नुस्खों के अनुसार किये गए आर्थिक सुधारों के फलस्वरूप बनी मंडी की अर्थव्यवस्था में समाज के कमजोर वर्गों की स्थिति खराब हो गई, ऊपर से युक्रेन संकट के कारण लगे पश्चिमी प्रतिबंधों ने मध्यम वर्ग के लोगों को भी बेरोजगारी जैसी समस्याओं का सामना करने को मजबूर कर दिया है। इन परिस्थितियों में पुरानी सोवियत व्यवस्था की सामाजिक सुरक्षा की याद आना स्वाभाविक ही है।

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