सोच और उम्मीद

Capture

अजय गुप्ता

आज गोमती किनारे बैठकर लिख रहा हूं। मन कर रहा है कि एक कविता लिख डालूं पर गोमती के हो रहे सौन्दर्यीकरण को देखकर सोचा कि कुछ दिन और रुक जाऊं। पूरी तरह सौन्दर्य निखर जाए, फिर लिखूंगा। अभी गोमती का सौन्दर्य एक सोच और उम्मीद है। इस सोच और उम्मीद को प्रतीक और बिम्ब बनने तक इन्तजार करना होगा। यही सोचते-सोचते कब गोमती के बैराज पुल पर आ गया…। बैराज पुल की हरी-पीली-लाल-नीली रोशनी देखी तो कुछ स्वप्न जागने लगे। तभी पीछे से किसी गाड़ी के हार्न ने जगा दिया। मैं थोड़ा साईड में आ गया और फिर चलते-चलते स्वप्न तो देखा साईकिल/ पैदल पथ पर मैं चल रहा था। आराम से सोचते हुए, स्वप्न देखते हुए, यह भी एक सोच और उम्मीद ही थी जो आज अपना अर्थ और सार्थकता दोनों पा गई है। मैं मन ही मन मुस्कराया। मेरा प्रदेश…। मन में लंदन के साईकिल पथ और टेम्स का किनारा जीवंत हो उठा। तभी चौराहा आ गया 1090। चार वर्षों में इन चार नम्बर ने कितनी सोच और उम्मीद जगाई है। बड़ी स्क्रीन पर 1090 की सार्थक पहल की सोच को देख कर लगा कि वास्तव में यह सुरक्षा और सम्मान दोनों की पूर्ति है।

बहुत गर्मी थी और मैंने आइसक्रीम खरीदी। सोचा कि कुछ देर के लिए सामने बने इस स्मारक स्थल में टहल लूं। पर पत्थरों की गर्मी ने मेरी हिम्मत को पिघला दिया। सोचा यहां नहीं, कहीं और किसी हरियाली के बीच , जहां दो पल बैठ कर कुछ सोचूं। कुछ उम्मीद के साथ.. तभी लोहिया पार्क दिख गया। अंदर पहुंच कर एक पेड़ की छाया में बैठ कर सोचने लगा कि पत्थरों के मायाजाल से लोहिया पार्क की हवाओं में एक मुलायम सा सुकून है। शाम होने को आ गई थी। याद आया कि एयरपोर्ट जाना है। दोस्त को लेने। शहीद पथ पकड़ा और पहुंच गये। थोड़ा जाम था। एयरपोर्ट के पास मेट्रो के खड़े होते खम्भों को देखा और कल्पना करने लगा। जब मैं मेट्रो में चलूंगा और आवाज आएगी ‘अगला स्टेशन चारबाग’…फिर लगा मेट्रो में चलने की सोच और उम्मीद के आगे सडक़ पर 10 मिनट के जाम में फंसना कितना सुखद और आनंददायक है। दोस्त को लेकर लौटा तो वह बोला, 4 वर्षों में कितना बदल गया है। मैं मुस्कराया। वह बोला चारबाग होकर चलो ताकि सब देख सकूं। चारबाग से निकलते हुए फिर वही मेट्रो का काम…। लगा, मेट्रो तेजी से आगे बढ़ रही है। कुछ ही दिनों में मेट्रो की उम्मीद जमीन का सीना फाडक़र अंडरग्राउण्ड हो जाएगी। सब तरफ उम्मीद है, जमीन पर, जमीन के ऊपर और जमीन के नीचे…। दोस्त बोला कल आगरा चलना है। गांव में शादी है। बोला एक्सप्रेस-वे बन गया। मैंने कहा ‘हां’ बन गया है, बस चलने की उम्मीद बाकी है। बोला इतनी जल्दी…मैंने बोला यह 4 वर्षों की सोच है। अब जमीन पर उम्मीद जगा रही है।
दोस्त बोला, लग रहा है कि सब बदल गया। मैं फिर मुस्कराया। गांव पहुंचे, शादी निपटाई, दोस्त के ड्राईवर के घर शादी थी। गांव में चर्चाएं थीं, सरकार अच्छा कर रही है। सरकार के कार्यक्रम गांवों में लैपटॉप पर लोग देख रहे थे। ड्राईवर ने बताया कि जब से बेटे को सरकार ने लैपटॉप दिया है, बेटा बहुत सपने देखता है। कहता है कि अपना बिजनेस करेगा और जब से लैपटॉप पाने वालों को सरकार ने अनुदान/ऋण की घोषणा की है.. उसने निर्णय ले लिया है कि वह अपना बिजनेस ही करेगा। लोगों की इतनी बड़ी उम्मीदों को भक्ति और आस्था का रास्ता जो मिल गया था।
रास्ते भर ‘विकास’ बोलता रहा। ‘विकास’ सुनता रहा, ‘विकास’ मेरा दोस्त। बोला मैं भी बैंगलौर से लखनऊ आ जाता हूं। यहां महानगर के ग्लैमर के साथ अपनेपन की महक भी है। बोला बहुत पैसा निवेश हो रहा है। जॉब भी आसानी से मिल जाएगी। तभी अचानक बोला, यार इतना सब कैसे, 4 वर्षों में फिर भी आलोचना। मैं शांत रहा, सोचा जो करना है वह किया जा रहा है। जो दिखना था वह दिख रहा है और आलोचना… सुनिए और मुस्कराइये। आलोचना की सोच और उम्मीद को कतर््व्य और कार्य से ही जवाब दिया जा सकेगा। विकास बोला लकीवुड जैसा कुछ है क्या? मैंने कहा, इसका मतलब? बोला, लोग कह रहे हैं कि बॉलीवुड की तरह प्रदेश में फिल्म बनाने वाले लकीवुड कह रहे हैं। मैं मुस्कराया, कुछ फिल्मी सितारों से मित्रता को सोच ने प्रदेश में फिल्म निर्माण की उम्मीद जताई थी। आज वह कैमरे और लाईट्ïस के साथ साकार हो रही है।
अब हम कालीदास मार्ग पर आ गये थे। कालीदास मार्ग पर खड़े होकर मैं सोच रहा था…अशोक और अकबर को महान कहने के पीछे उनका 40-50 वर्षों का राजकाज था। पर आज हम 5 वर्षों में ही सरकार की आलोचना करने लगते हैं। महान कार्य करने और महान बनने के लिए समय तो देना ही होगा। कालीदास मार्ग के पास लोहिया पथ पर तीन स्तम्भ बनते देखा तो मैं अशोक के स्तम्भों पर लिखे लेखों के बारे में सोचने लगा कि वह लेख कितने महत्वपूर्ण थे क्योंकि अशोक को महान बनाने के लिए उसके स्तम्भों पर लिखे लेख ही मुख्य आधार बने थे। वैसे ही सरकार हर जिले और शहर के चौराहों पर ऐसे कर्म-स्तम्भ क्यों नहीं लगवाती, क्यों नहीं उसमें जनता के लिए किये जा रहे कार्यों को लिखवाती, ताकि वर्षों बाद भी जनता जान सके कि अच्छा शासन क्या था। चौराहा पार करते लोग जब उस स्तम्भ के पास से गुजरे और सेल्फी लेते हुए सोच और जाने …कि विकास की सोच और उम्मीद एक प्रयास और सफलता दोनों हैं…और लोग समझ सकें…जो बदला है और जो बदलेगा…वह अखिल उम्मीद और मुलायम सोच का सृजन और परिणाम है।

Pin It