सैशे में मौत!

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। शकुंतला पिछले तीन महीने से अपने अंदर आ रहे बदलावों को लेकर चिंतित थी। बालों में सफेदी और चिडि़चिड़ेपन पर जब उन्होंने गहन मंथन किया तो माजरा समझते देर नहीं लगी। दरअसल बरेली से लखनऊ शिफ्ट हुईं शकुंतला ने लखनऊ आकर सैशे प्रोडक्ट का इस्तेमाल करना शुरू किया था। शैम्पू हो या फिर घर का जरूरी समान वह छोटी पैकिंग का सामान इस्तेमाल कर रही थीं। इसी तरह की मिलती जुलती कहानी रजिया खातून की भी है। बमुश्किल घर चला रही रजिया भी छोटी पैकिंग का सामान इस्तेमाल करती हैं। उनके होश तब उड़ गये जब उनकी नजर अपनी नाती रुकसाना के बालों पर पड़ी। महज 9 वर्ष की रूकसाना के आधे से ज्यादा बाल सफेद हो चुके हैं। गहन जांच पड़ताल के बाद पता चला कि ब्लो द स्टैंडर्ड प्रोडक्ट इस्तेमाल करने के चलते ऐसा हुआ। यह कहानी सिर्फ शकुंतला या फिर रजिया की नहीं है बल्कि प्रदेश का हर तीसरा व्यक्ति इस तरह की दिक्कतों की गिरफ्त में है। शहरी क्षेत्रों के साथ साथ यह बीमारी ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेजी से पांव पसार रही है और वहां तो बात मुंह के कैंसर और दूसरी घातक बीमारियों तक पहुंच चुकी है।
गौरतलब हो कि आज के बाजारीकरण में कम्पनियां उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं। कम्पनियों के उत्पाद समाज के एक विशेष वर्ग के लिए होते हैं। अगर आप उच्च वर्ग के हैं तो आप पूरा डिब्बा या बड़ा पैकेट खरीदिये लेकिन अगर आप बड़ा पैकेट खरीदने में असमर्थ हैं तो कम्पनियां मात्र 1 से 5 रुपये के सैशे में आपको सैम्पू, खाने का तेल, लगाने का तेल, माउथ फ्रेशनर, गुटखा, पिसी हल्दी, पिसी धनिया, पिसी मिर्ची, बच्चों के लिए कुरकुरे की तर्ज पर उत्पाद उपलब्ध करा देती हैं।
कितनी अच्छी बात है कि जितनी जरूरत हो उतना ही सामान खरीदें, ‘ना बचे ना चूहे खायें’। लेकिन क्या कभी आपने पाउच के पीछे उस प्रोडक्ट की मैनुफेक्चरिंग और एक्सपायरी डेट देखी है। नहीं न, तो अब देखियेगा इसमें मैनुफेक्चरिंग व एक्सपायरी डेट और उस उत्पाद के इन्डेंट की जानकारी अक्सर आपको उन पाउचों पर नहीं मिलेगी, जिसकी वजह से ही ये सारी कम्पनियां सालों साल उस प्रोडक्ट को बाजार में बेचती रहती हैं और हम खुशी खुशी इस तरह के उत्पाद को उपयोग में लाते रहते हैं। हमारे इसी रवैये से इन कम्पनियों को ऐसा करने का बढ़ावा मिलता है। आपको शहर की हर एक गली में 5 से 6 गुमटी वाली दुकानें और 2 से 3 छोटी जनरल स्टोर की दुकानें जरूर मिल जायेंगी, जो इन पाउचों की लड़ी को अपनी दुकानों पर बड़ी ही खूबसूरती के साथ सजा कर रखती हैं।
आंकड़े बताते हैं कि इन पाउचों की बिक्री सील बन्द उत्पादों से कहीं ज्यादा होती है। इनके प्रमुख खरीदार मध्यम व निम्न वर्ग के लोग होते हैं। जो इन सब बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते और कम्पनियां उत्पाद मानकों व गुणवत्ता को ताक पर रख कर धड़ल्ले से अपना समान बेचकर सिर्फ पैसा बनाने मेें लगी हुयी हैं वहीं दूसरी ओर उपभोक्ता इससे बेखबर रहता है।
उपभोक्ता दिनेश ने अपना अनुभव हमारे साथ साझा किया उन्होंने बताया कि एक दिन उनका सैम्पू का डिब्बा खत्म हो गया था और दुकानदार ने उन्हे ये पाउच वाला शैम्पू दे दिया जिससे उनके सिर मे छोटे-छोटे दाने निकल आये थे। उपभोक्ता राजेन्द्र ने बताया कि उन्होंने एक बार पिसी हुयी लाल मिर्ची का पैकेट खरीदा जिसमें उन्हे ईंट,पत्थर के टुकड़े मिले। वो तो अच्छा हुआ कि उपयोग में लाने से पहले उन्होंने उसे देख लिया।

सैशे वाले उत्पाद की कोई प्रमाणिकता नहीं होती है, अगर किसी तरह का कोई नुकसान हो जाता है तो उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए कोई सामने नहीं आता है। भुक्तभोगी इधर उधर दौड़ता रहता पर उसकी सुनने वाला कोई नहीं होता। ज्यादातर इन उत्पादों का उपयोग आर्थिक रूप से कमजोर लोग ही करते हैं। कोई भी सामान खरीदना है तो सही दुकान से खरीदें वहॉ मिलावटी और नकली सामान मिलने की सम्भावना कम रहती है क्योंकि वहां समय-समय खाद्य अधिकारी जांच करते रहते हैं।
डॉ.आर. सी. अग्रवाल
लोहिया अस्पताल
भारत में जो खाद्य के लिए मानक बनाये गये हैं किन्हीं कारणवश वो अमल में नही लाये जा रहे हैं जिसकी वजह से आये दिन लोग बीमार पड़ रहे हैं और नयी तरह की बीमारियां भी उत्पन्न हो रही हैं। इस समस्या से निजात पाने के लिए जरूरी है कि खाघ और आपूर्ति विभाग इस तरह के उत्पादों को संजीदगी से ले और गलत पाये जाने पर उनके खिलाफ तुरन्त कार्रवाई करे।
डॉ. राजेश ओझा,
सिविल अस्पताल

दुकानदार अमर ने पूछने पर बताया कि सील बन्द डिब्बों और इन पाउचों में गुणवत्ता का अन्तर रहता है, इनमें वो गुणवत्ता नहीं मिलती जो कि पैकेट या डिब्बे में होती है फिर भी बहुत ज्यादा मूल्य न होने की वजह से उपभोक्ता इसका उपयोग करते हैं।

अगर कोई उत्पाद मल्टीपीसेश पैकेट है तो ये जरूरी नहीं है कि उसके हर एक पीस पर मैनुफैक्चरिंग, एक्सपायरी डेट और उसके इन्डेंट की जानकारी हो। क्योंकि एक छोटे से पैक पर इतनी जानकारी आना सम्भव नहीं होगा। लेकिन ये बेहद जरूरी है कि उसके मुख्य पैकेट या गत्ते पर ये सारी जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। आश्वासन के रूप में मानें तो अगर ऐसी कोई समस्या उत्पन्न होती है तो विभाग तुरन्त कार्रवाई करेगा। वैसे उपभोक्तओं को भी जागरूक होने की जरूरत है।
जेपी सिंह, खाद्य अधिकारी

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