सेना प्रमुख की नियुक्ति वरिष्ठता और सवाल

राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि सेना देश की रक्षा करती है। उसके अपने नियम और कायदे होते हैं। इन नियमों पर सेना के जवान चलते हैं। उनका यह अनुशासन ही सेना की मजबूती का राज भी है। ऐसे में राजनीतिक दलों को अपने स्वार्थ के लिए ऐसे सवाल से बचना चाहिए। ऐसे सवाल न केवल सरकार बल्कि इससे ज्यादा महत्वपूर्ण चयनित व्यक्ति की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह
लगाते हैं।

sajnaysharmaलेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को मोदी सरकार ने अगला सेना प्रमुख घोषित कर दिया है। रावत की यह नियुक्ति वरिष्ठïता को दरकिनार कर की गई है। इस पर विपक्ष ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने पूछा है कि वे कौन सी वजहें हैं जिसके कारण सेना में वरिष्ठïता क्रम को नजरअंदाज करना पड़ा। अहम सवाल यह है कि क्या विपक्ष के इन सवालों से सेना के मनोबल पर असर पड़ेगा?ïï क्या सेना में वरिष्ठïता क्रम को हमेशा से पत्थर की लकीर माना जाता रहा है? क्या सरकार के पास सेना प्रमुख की नियुक्ति का विशेषाधिकार नहीं है? पड़ोसी देश पाकिस्तान से जब आतंकियों की फौज भारत भेजी जा रही हो और सीमा पर लगातार सीजफायर तोड़ा जा रहा हो तो क्या ऐसे सवाल लाजिमी है? क्या सेना को लेकर राजनीति से परहेज करने की जरूरत नहीं है? विपक्षी दलों का यह सवाल अपनी जगह सही हो सकता है कि लेफ्टिनेंट जनरल रावत की नियुक्ति वरिष्ठ सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीण बख्शी जो पूर्वी कमान के प्रमुख हैं और दक्षिणी कमान प्रमुख पीएम हरीज की वरिष्ठïता की अनदेखी कर की गई, लेकिन ऐसे सवाल निश्चित रूप से सेना को कहीं न कहीं से प्रभावित करते हैं। राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि सेना देश की रक्षा करती है। उसके अपने नियम और कायदे होते हैं। इन नियमों पर सेना के जवान चलते हैं। उनका यह अनुशासन ही सेना की मजबूती का राज भी है। ऐसे में राजनीतिक दलों को अपने स्वार्थ के लिए ऐसे सवाल से बचना चाहिए। ऐसे सवाल न केवल सरकार बल्कि इससे ज्यादा महत्वपूर्ण चयनित व्यक्ति की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। क्या विपक्ष को इस बारे में सोचने की जरूरत नहीं समझ आती है। लेफ्टिनेंट जनरल रावत के पास पिछले तीन दशकों से भारतीय सेना में विभिन्न स्तरों एवं युद्ध क्षेत्रों में सेवाएं देने का बेहतरीन अनुभव है। रावत ने पाक-चीन से लगती भारतीय सीमा एवं पूर्वोत्तर सहित कई क्षेत्रों में अहम जिम्मेदारियां सफलतापूर्वक संभाली हैं। माना जा रहा है कि सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों और कश्मीर में बिगड़ रहे हालातों को देखते हुए ऐसा कदम उठाया है। वैसे पिछले कई वर्षों से उच्च पदों पर हो रही नियुक्ति को लेकर विवाद होता रहा है। सीवीसी का मामला हो या अन्य शीर्ष अधिकारियों के चयन का मामला हो सरकार को विपक्ष कटघरे में खड़ा करता रहा है। सरकार को भी समझना चाहिए कि वह ऐसे विवादास्पद निर्णय लेने से बचे। महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सरकार विपक्ष का सहयोग लेकर एक अच्छा उदाहरण पेश कर सकती है ताकि विवादों से बचा जा सके। यदि हर शीर्ष पद पर नियुक्ति को लेकर विवाद होते रहे तो इसे कदापि उचित नहीं कहा जा सकता है।

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