सीएम साहब! अब समय आ गया है नायक बनने का

Captureपार्टी का वोटर कभी नहीं रहा लेकिन व्यक्तिगत तौर पर अखिलेश यादव जी का प्रशंसक रहा हूं। जिस भी चर्चा, समारोह, रैली में वो उपस्थित रहते हैं वहां उनके मुस्कुराते चेहरे, फिट शरीर और छोटे हंसमुख जवाबों से हमेशा भीड़ के अन्दर उत्साह बना रहता है लेकिन एक शैली जिसे मैंने हमेशा अखिलेश यादव के अन्दर अनुपस्थित पायी, वो थी ‘नायकत्व’ की शैली।
मेरा मानना है कि अखिलेश यादव जी को समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं ने तो अपना नेता स्वीकार कर लिया लेकिन वो खुद को अधिकांश मौकों पर उन सबका नेता साबित करने में नाकाम रहे हैं और हालिया हुई एक अनुशासनात्मक कार्यवाही ने इस बात को पुख्ता भी किया है। स्थानीय पत्रकार लगातार गायत्री प्रसाद प्रजापति जी को लेकर सवाल कर रहे थे, राष्ट्रीय पत्रकार लगातार आजम खान साहब को लेकर सवाल कर रहे थे, जनता लगातार पंडित सिंह जी को लेकर सवाल कर रही थी, डीजीपी लगातार राजा भैया को इशारा करके सवाल कर रहे थे और मुलायम सिंह यादव जी को सुनाई पड़ी तो सिर्फ उन्नाव, लखीमपुर और कुछ जगहों के पंचायत चुनाव लड़ रहे लोगों की व्यथा!
ये ना सिर्फ सवाल पूछ रहे लोगों के साथ ज्यादती है, ना सिर्फ ‘जनता के लोकतंत्र’ पर कुठाराघात है बल्कि ये सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह है अखिलेश यादव जी आपके नायकत्व पर! सुनील यादव को आपने तब क्यों सिर पर लाठी खानी दी जब उन्हें यूं ही फिर से एक जख्म देना था, आनंद भदौरिया के स्वाभिमान को तब क्यों जूते तले कुचलवाया था जब उनका स्वाभिमान आप खुद बरकरार नहीं रख सकते थे! आपके सिर्फ सैफई समारोह के उद्ïघाटन में अनुपस्थित रहने से आपकी चिंताओं को मुझ जैसा पार्टी से दूर खड़ा आदमी भी स्वीकार नहीं कर सकता।
ये दो नौजवान समाजवादी ना केवल सार्वजनिक मंचों से बल्कि व्यक्तिगत मुलाकातों में भी ‘मुख्यमंत्री जी जिंदाबाद’ के नारे लगाते थे, क्या ये इनका कसूर था? गांव-खलिहानों से जुड़े होने की वजह से महीने के 10 दिन उन्ही के बीच में से गुजार के सरकार के लिए सुझावों का जखीरा लेकर आते थे, क्या ये उनका कसूर था? पूरे भारत में सिर्फ एक ही पार्टी और एक ही नेता को जानते थे, क्या ये उनका कसूर था? टीवी की चमक दमक से दूर लगातार पार्टी और परिवार के बीच संतुलन बनाते हुए चल रहे थे, क्या ये उनका कसूर था? किसी सयाने नें एक बार कहा था की ‘हाथों में रेत हो तो आंखों में पानी आ ही जाता है।’
सिर से बहते खून को हाथ से रोके सुनील यादव जी को सिर्फ चि_ी लिखकर बाहर कर देना अगर सरकार का इस्तकबाल है तो मैं इसे सिरे से खारिज करता हूं। आपको अकेले सुनील जी को बाहर नहीं करना चाहिए था, उनके दोनों बेटों, उनकी पत्नी, उनके दोस्तों और उनसे मिलने जुलने वालों को भी पार्टी से बाहर करना चाहिए था क्योंकि सुनील जी सिर्फ अकेले पार्टी को समय नहीं दे रहे थे, बल्कि वो इन सबके हिस्से का समय जबरन इन सबके हिस्से से छीन कर आपको दे रहे थे। वह दो व्यक्ति जिन्हें समाजवाद और लोगों के समस्याओं को सुनने, सुलझाने के सिवा कुछ आता नहीं हो जिसने हमेशा पार्टी को अपने ‘घर के बाहर का घर’ माना हो, उसके घर को यूं छीनना अगर सरकार का इस्तकबाल है तो मैं इसे सिरे से खारिज करता हूं।
पंचायत चुनाव में हस्तक्षेप हॉवर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ कर आये नए समाजवादी कार्यकर्ता नहीं करेंगे मुलायम सिंह जी! वही करेंगे जो गांव, कस्बों और शहरों के बीच पुल बनाते हुए जनसेवा में लगे हैं। आपके हजार अनर्गल बयानों पर ये दोनों चुप रहे क्योंकि ये कार्यकर्ता हैं, पार्टी के तमाम फैसलों को मान-अपमान के साथ स्वीकारते चले क्योंकि ये कार्यकर्ता हैं, मंत्री बनते-हटते रहे क्योंकि ये कार्यकर्ता है, शाहखर्ची से लेकर सरकार की तमाम विफलताओं में भी कोई तर्क निकाल कर उसे सफल बताते रहे क्योंकि ये कार्यकर्ता हैं लेकिन आप? आप नेता होकर इनकी पसंद और पीड़ा को कितनी बार समझ पाए!
अखिलेश यादव जी ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय’। सुनील यादव और आनंद भदौरिया जी आपके ‘भैया से मुख्यमंत्री जी’ तक वाली यात्रा में खून, पसीने के साथ नि:स्वार्थ भाव से थे। हजार कारण उनके पास भी होंगे जब वो पार्टी से अलग हो सकते थे लेकिन उनके हजार कारण पर पार्टी का एक ही कारण भारी क्यों! अभी भी मौका है, मुझ जैसा पार्टी की मुखर आलोचना करने वाला व्यक्ति भी अगर ये चाहता है की आप सब साथ रहे तो उसे तो कम से कम आप एक इमानदार बयान मान ही सकते हैं।
आगे बढि़ए और अपने नायकत्व को साबित करिए और बोलिए सभी से कि- ‘छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता’। हार-जीत चुनावी प्रक्रियाओं का हिस्सा है लेकिन ईमानदार, शुभचिंतक और विश्वसनीय दोस्त यूं ही राह चलते नहीं मिला करते।
(लेखक स्तम्भकार हैं)

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