सिविल कोड, ट्रिपल तलाक और विरोध

“क्या केवल यूनिफार्म सिविल कोड लागू कर देने भर से सरकार महिलाओं को उनका अधिकार दिला सकेगी? क्या कानून बन जाने से समाज में महिलाओं के प्रति विद्यमान सामंती और पुरुषवादी सोच में परिवर्तन आ जाएगा? ऐसे कई चुभते सवाल और भी हैं।”

sanjay sharma editor5यूनिफार्म सिविल कोड, बहुविवाह और ट्रिपल तलाक का मुद्दा गरमा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ताजा बयान ने इसको और हवा दे दी है। मोदी ने कहा था कि महिला व बेटी किसी समाज या संप्रदाय की हो, उसे समान अधिकार मिलना ही चाहिए। सरकार इसके लिए पूरा प्रयास करेगी। इसी बीच लॉ कमीशन ने इस मामले पर जनता से 16 सवाल किए हैं और उन पर राय मांगी है। लेकिन केंद्र सरकार के इस कदम का जोरदार विरोध शुरू हो गया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का आरोप है कि यूनिफार्म सिविल कोड लागू कर मोदी देश को तोडऩा चाहते हैं। सरकार द्वारा ट्रिपल तलाक का विरोध करना गलत है। सवाल यह है कि मोदी सरकार द्वारा इस मुद्दे को उठाने के पीछे मंशा क्या है? क्या वह वाकई महिलाओं के अधिकारों को लेकर सजग है या इसके पीछे उसका कोई राजनीतिक स्वार्थ छिपा है? क्या केवल यूनिफार्म सिविल कोड लागू कर देने भर से सरकार महिलाओं को उनका अधिकार दिला सकेगी? क्या कानून बन जाने से समाज में महिलाओं के प्रति विद्यमान सामंती और पुरुषवादी सोच में परिवर्तन आ जाएगा? ऐसे कई चुभते सवाल और भी है। दरअसल, देश में यूनिफार्म सिविल कोड भाजपा के एजेंडे में है और लॉ कमीशन द्वारा जनता से इस पर राय मांगना इसी का एक पहलू है। सरकार के अपने तर्क हैं। उसका कहना है कि कई मुस्लिम देशों में यूनिफार्म सिविल कोड लागू हैं, लिहाजा इसका विरोध अनुचित है। यह कि ट्रिपल तलाक के खत्म होने से महिलाओं को उनका वाजिब हक मिलेगा। इस मुद्दे पर आम राय बनाने के लिए लॉ कमिशन ने 16 सवालों की प्रश्नावली जारी कर 45 दिनों में जवाब मांगा है। इसमें मुस्लिम के अलावा हिंदू और ईसाइयों से भी सवाल किए गए हैं। लेकिन जैसे ही कमीशन ने सवाल जारी किए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड नाराज हो गया। बोर्ड के महासचिव मौलाना मोहम्मद वली रहमानी ने ट्रिपल तलाक और सिविल कोड को लेकर मोदी सरकार पर देश को तोडऩे का आरोप लगाया और इसे भारत जैसे विविधता वाले देश के लिए मुनासिब नहीं बताया। उन्होंने पीएम को नसीहत दी कि वे पहले देश के बाहर के दुश्मनों से निपटे, देश के भीतर दुश्मन न पैदा करें। बोर्ड ने सवालनामे के बहिष्कार का भी ऐलान किया है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने तीन तलाक को खत्म करने की राय दी है। बोर्ड ने इसके खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की है। कुल मिलाकर दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। बावजूद सरकार को चाहिए कि वह इससे प्रभावित होने वाले लोगों से व्यापक विचार-विमर्श करने के बाद ही कोई ठोस कदम उठाए। सरकार को इस पर जल्दबाजी से बचना चाहिए अन्यथा उसकी मंशा चाहे जितनी अच्छी हो संदेश गलत ही जाएगा। यह तब और जरूरी है जब मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुका हो।

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