सिर्फ कागजों पर ही संयुक्त हैं लोहिया संस्था व अस्पताल

  • साल भर बाद भी लोहिया अस्पताल व संस्थान के विलय में हैं कई पेंच
  • लोहिया इंस्टीट्यूट में मरीजों को मिल रही केवल नाम मात्र की इमरजेंसी सेवा
  • संस्थान को मेडिकल कालेज का रूप देने में और अधिक समय लगने की आशंका

Captureवीरेन्द्र पांडेय
लखनऊ। समाजवादी सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट डॉ.राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान समाजवादी सोच पर खरा नहीं उतर पा रहा है। दरअसल लोहिया संस्थान का चार्ज अधिक होने के कारण गरीब आदमी उसमें इलाज कराने से कतराता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि अभी तक लोहिया अस्पताल की इमरजेंसी सेवा भी पूरी तरह से शुरू नहीं हो पायी। यदि लोहिया संस्थान की इमरजेंसी सेवा पूरी तरह से शुरू हो जाए तो ट्रामा सेन्टर का भी भार कम हो सकता है। अब तक यहां पर इमरजेंसी सेवा के नाम पर कार्डियक तथा न्यूरो के ही मरीजों का इलाज हो पा रहा है। गैस्ट्रो तथा अन्य बीमारियों से पीडि़त गम्भीर मरीजों को इमरजेंसी में इलाज नहीं मिलता है। इसके लिए दूसरे अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। वहीं न्यूरो के मरीजों के इमरजेंसी इलाज में भी काफी समस्या आती है। कई बार तो संस्थान के निदेशक डॉ. दीपक मालवीय के हस्तक्षेप के बाद ही गम्भीर मरीजों का इलाज शुरू हो पाता है।
सपा सरकार का उद्देश्य लोहिया संस्थान में बेहतर चिकित्सकीय सेवाएं उपलब्ध कराने की सुविधा देकर मरीजों को कम दाम में इलाज का लाभ दिलाना था। आलम ये है कि लोहिया संस्थान बनकर तैयार हुए कई साल हो चुका है और इसमें लोहिया अस्पताल का विलय कर मेडिकल कालेज बनाने की कवायद की जा रही है। शासन स्तर से इसके विलय की घोषणा भी हो चुकी है लेकिन यह घोषणा सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। विलय के नाम पर मरीजों को रंच मात्र की भी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। संस्थानों का विलय होने के बाद भी दोनों संस्थानों में पर्चा बनवाने का शुल्क अलग-अलग है। लोहिया अस्पताल में पंजीकरण शुल्क एक रुपया है, तो लोहिया इंस्टीट्यूट में पंजीकरण शुल्क 100 रुपये है। इस कारण मरीज लोहिया संस्थान जाने से कतराते हैं। इतना ही नहीं लोहिया अस्पताल का पर्चा लोहिया संस्थान में मान्य भी नहीं है।

विलय में आ रही समस्या
यदि लोहिया संस्थान का पंजीकरण शुल्क लोहिया अस्पताल की तरह एक रुपया कर दिया जाय, तो मरीजों को वह सुविधाएं देना मुश्किल हो जाएगा, जो एसजीपीजीआई में मिलती हंै। दूसरी बात यह है कि ऐसा कर देने पर इस अस्पताल की हालत भी अन्य अस्पतालों जैसी हो जायेगी। इसलिए बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जा रही है।
एमबीबीएस शुरू होने में हो सकती है देर
डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में वर्ष 2017 में 150 सीटों पर एमबीबीएस का कोर्स शुरू होना है। इसके लिए सपा सरकार ने करोड़ों का बजट भी जारी कर दिया है। उसके बाद भी एकेडमिक ब्लॉक के निर्माण में बिलंब कर लापरवाही की नजीर पेश की जा रही है। इसी एकेडमिक ब्लाक में अगले सत्र से एमबीबीएस कोर्स भी शुरू होना था,जिसमें अब काफी देर होने की आशंका है। लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के अंदर स्थित 14 मंजिल के एकेडमिक ब्लॉक का निर्माण हो रहा है। इसके 6 फ्लोर जुलाई तक निर्मित होने थे तथा संस्थान को हैंडओवर किया जाना था लेकिन अब तक निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया। काम कब तक पूरा होगा, इस बारे में निर्माण एजेंसी भी चुप है। ऐसे में निर्माण कार्य समय से पूरा करवाना मुश्किल लग रहा है।

लोहिया अस्पताल और लोहिया इंस्टिट्यूट दोनों अस्पतालों के विलय का काम चल रहा है। अभी अस्पताल जिस व्यवस्था के तहत चल रहा है, उसी व्यवस्था के अनुसार कुछ दिन और चलेगा। हम लोगों ने कार्डियक और न्यूरों के मरीजों के लिए इमरजेंसी सेवा काफी पहले से शुरू है। न्यूरो और कार्डियक की इमर्जेन्सी इंस्टीट्यूट की तरफ से शुरू की गयी है। बाकी अन्य इमर्जेन्सी केस अस्पताल के डाक्टर देखते हैं।
प्रोफेसर दीपक मालवीय, निदेशक, लोहिया इंस्टिट्यूट 

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