साहित्यकारों में रोष

साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे वाली घटनाएं लगातार हो रही हैं, जिसकी वहज से देश का माहौल ठीक नहीं है। बेवजह का तनाव बढ़ रहा है। इसी कड़ी में देश में बढ़ रही असहिष्णुता के मुद्ïदे पर साहित्यकार भी लामबंद हो गए हैं। अब तक 40 से अधिक साहित्यकारों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया है।

sanjay sharma editor5वर्तमान में देश में सब कुछ सामान्य नहीं है। साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे वाली घटनाएं लगातार हो रही हैं, जिसकी वहज से देश का माहौल ठीक नहीं है। बेवजह का तनाव बढ़ रहा है। इसी कड़ी में देश में बढ़ रही असहिष्णुता के मुद्ïदे पर साहित्यकार भी लामबंद हो गए हैं। अब तक 40 से अधिक साहित्यकारों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया है। कुछ साहित्यकारों ने अपने अहम सरकारी पद से इस्तीफा दे दिया है।
मशहूर कन्नड़ लेखक एम.एम. कुलबर्गी की हत्या के विरोध में साहित्यकारों ने अपना विरोध शुरू किया जो अब तक चल रहा है। 13 अक्टूबर से साहित्यकार अपना पुरस्कार लौटा रहे हैं, लेकिन सबसे दुखद पहलू है कि साहित्यकार दो फाड़़ में बंट गए हैं। जो साहित्यकार पुरस्कार लौटा रहे हैं उनका कुछ साहित्यकार विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि पुरस्कार लौटाना गलत है। विरोध के और भी बहुत से तरीके हैं। 23 अक्टूबर को साहित्यकारों ने मुंह पर काली पट्ïटïी बांधकर दिल्ली के श्रीराम सेंटर तक मौन जुलूस निकाला। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि पुरस्कार लौटाना पहला कदम है। अब मौन जुलूस निकाल रहे हैं। यदि अब भी हालात नहीं बदले तो प्रदर्शन और मुखर व तेज होंगे।
दूसरी ओर पुरस्कार लौटाने वालों के खिलाफ भी प्रदर्शन हुआ, जिसमें लेखकों के लिए ‘गेट वेल सून’ वाले पोस्टर दिखाए गए। लेखकों का विरोध करने वालों का कहना है कि जो साहित्यकार पुरस्कार लौटा रहे हैं उनका साहित्य भारतीय संस्कृति और दर्शन का रूप नहीं है। अब तो इसमें भी राजनीति होने लगी है। तरह-तरह के बयान आने लगे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा में मशहूर शायर मुनव्वर राना रहे। पहले उन्होंने पुरस्कार लौटाने वालों की आलोचना की और बाद में खुद पुरस्कार लौटा दिया। इसके बाद से इस मुद्दे पर जमकर राजनीति होने लगी है। मुनव्वर राना ने यह बयान देकर और चौंका दिया कि प्रधानमंत्री कहेंगे तो मैं पुरस्कार वापस ले लूंगा। उन्होंने यह भी कहा कि पीएमओ ऑफिस से उनके पास फोन आया था कि प्रधानमंत्री मिलना चाहते हैं। मुनव्वर राना ने यह भी कहा कि अगर प्रधानमंत्री और भी साहित्यकारों को बुलाते तो अच्छा था।
फिलहाल इस मुद्ïदे पर जमकर राजनीति हो रही है। अधिकांश साहित्यकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री को इस मुद्ïदे पर हस्तक्षेप करना चाहिए। कुल मिलाकर सारा ठीकरा केन्द्र सरकार पर फोड़ा जा रहा है। इस मुद्ïदे पर कब विराम लगेगा यह तो समय बताएगा लेकिन यह तो तय है कि इन सब से देश का माहौल बिगड़ रहा है।

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