सालों पुरानी फेको मशीन से ऑपरेशन कर मरीजों की आंखों में भरी जायेगी रोशनी

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की लापरवाही, मरीजों पर भारी

  • सिविल अस्पताल में रखी सालों पुरानी मशीन को भेजा गया रानी लक्ष्मीबाई अस्पताल
  • स्वास्थ्य विभाग लेंस और कैसेट के लिए अस्पतालों को नहीं देता है बजट
  • अपने खर्चे पर अस्पताल करते हैं मरीजों की आंखों का इलाज

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। एक तरफ जहां प्रदेश सरकार अस्पतालों मे फेको मशीन की सुविधा देकर लोगों के आंखों मे रंग भरना चाहती है। वहीं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अपनी कछुआ चाल के चलते सरकार की मंशा पर पानी फेर रहे है। राजधानी के आरएलबी अस्पताल में सालों पुरानी फेको मशीन देकर स्वास्थ्य विभाग ने अपनी इतिश्री तो कर ली है, लेकिन मरीजों को इससे कितना लाभ मिलेगा। इसका पता तो आने वाला समय ही बतायेगा। राजधानी के बड़े अस्पतालों में फेको मशीन से किये गये मरीजों के इलाज के आंकड़े बताते हैं कि अभी तक इसका प्रदर्शन दयनीय ही रहा है। जब बड़े अस्पतालों में इस मशीन से महीनों मे एक या दो आपरेशन किये जा रहे हों तो इस बात का अंदाजा लगाना असान है कि मरीजों को इस लाखों की मशीन का कितना लाभ मिल रहा है। जानकारों की माने तो सरकारी उदासीनता के चलते मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पाता है।
आरएलबी अस्पताल प्रशासन ने जिस फेको मशीन से मरीजों के इलाज का दवा किया है। वह मशीन आरएलबी अस्पताल में आने से पहले हजरतगंज स्थित सिविल अस्पताल में थी। वाहवाही लूटने के चक्कर में आरएलबी अस्पताल के अधिकारियों ने नई सुविधाओं के साथ-साथ पुरानी बंद पड़ी मशीन का भी उद्ïघाटन करा दिया था। बताते चले कि मंगलवार को राजाजीपुरम स्थित रानी लक्ष्मीबाई अस्पताल (आरएलबी) में चिकित्सा स्वास्थ्य राज्यमंत्री डॉ. एसपी यादव, उच्च शिक्षा राज्यमंत्री शारदा प्रताप शुक्ला व समाजवादी पार्टी की विधान सभा प्रत्याशी अपर्णा यादव ने नई सुविधाओं व मशीनों का उद्घाटन किया था। इस दौरान अस्पताल में नए वाटर कूलर शुरू कर मरीजों को शुद्ध पानी की सुविधा दिलाई गयी थी। वहीं फेको मशीन व माइक्रोस्कोप का उद्घाटन कर आधुनिक विधि से आंखों के ऑपरेशन का दावा किया गया था। लेकिन अधिकारियों द्वारा माननीयों से उद्घाटन कराई गई फेको मशीन वर्षो पुरानी है। वहीं मौजूदा हालत में वह बंद पड़ी है।

अस्पताल के बजट पर निर्भर रहता है मरीज का इलाज
सरकारी अस्पतालों में फेको मशीन से किया गया मोतियाबिन्द का इलाज पूर्णतया मुफ्त होता है। जबकि निजी संस्थानों में इस विधि से इलाज कराने में 20 से 30 हजार का खर्च आता है। राजधानी के बलरामपुर तथा लोहिया अस्पताल में सीएमएसडी की तरफ से फेको मशीन में लगने वाले कैसेट तथा लेंस की सप्लाई नहीं की जा रही है। इन दोनों बड़े अस्पतालों में यहां का प्रशासन अपने पास उपलब्ध बजट का इस्तेमाल करके लेंस तथा कैसेट मंगाता है।

फेको मशीन से मोतियाबिन्द का इलाज आधे घंटे में
लगभग 19 लाख की कीमत की इस मशीन से मरीज के आंखों के मोतियाबिन्द का आपरेशन महज आधे घंटे मे हो जाता है तथा आपरेशन के बाद वह अपने घर तत्काल जा सकता है। जबकि ओपन सर्जरी मे मोतियाबिन्द के आपरेशन में एक से दो घंटे का समय लगता है।

बजट के अभाव में बंद पड़ी थी मशीन

जो फेको मशीन आरएलबी अस्पताल में मौजूदा समय में रखी हुयी है। वो सिविल अस्पताल में सालों तक धूल फांकती रही है। यहां पर मशीन के धूल फांकने का मुख्य कारण स्वास्थ्य विभाग की तरफ से लेंस तथा कैसेट की सप्लाई का नहीं करना था। अस्पताल प्रशासन अपने स्तर पर जितने लेंस तथा कैसेट मंगा पाता था। उतने ही मरीजों के आपरेशन किये जाते थे। सूत्रों की मानें तो राजधानी के अस्पतालों में फेको मशीन से इलाज कराने के लिए मरीजों को अपनी जेबें ढीली करनी पड़ती है। अस्पतालों का बजट तो महज दिखावा है। अस्पतालों में पहुंचने वाले मरीज अपने खर्चे पर इस मशीन से इलाज करा पाते हैं। सिर्फ उन्हीं का इलाज हो पाता है। जानकारों की मानें तो सरकारी अस्पतालों में फेको मशीन द्वारा ऑपरेशन व आंखों को इलाज सस्ता होता है, इसलिए लोग यहां आते हैं। प्राइवेट में जहां मोतियाबिंद ऑपरेशन के 20 से 30 हजा रुपये लगते हैं वहीं सरकारी अस्पतालों में 2500 रुपये में ऑपरेशन हो जाता है। यहां पर मशीन में लगने वाली कैसेट 500 रुपये की तथा लेंस की कीमत 1500 रुपये आती है। इसको मरीज खरीद कर दे देता है और उसका ऑपरेशन हो जाता है।

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