सांस की बीमारी से लेकर हृदय रोग तक का प्रमुख कारण बन रहा प्रदूषण

  • दुनियां के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में 18वें स्थान पर है लखनऊ
  • युवाओं में प्रदूषण की वजह से फैल रहीं तमाम तरह की बीमारियां

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। दुनियां में वायु प्रदूषण की वजह से सालाना 70 लाख लोग मौत के मुंह में समा जा रहे हैं। जो लोग लंबे समय तक धूल और गंदगी भरे वातावरण में रहते हैं। उनमें सांस संबंधी बीमारियों के अलावा कैंसर और हृदय से जुड़ी बीमारियां होने का खतरा अधिक रहता है। शहरों में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों, पेट्रोल और डीजल गाडिय़ों से काफी प्रदूषण फैल रहा है, जो पर्यावरण और इंसान दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। ऐसे में अपनी सेहत का ध्यान रखना जरूरी हो गया है।
दुनियां के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 50 प्रतिशत शहर भारत के हैं। यह आंकड़ा पर्यावरण के प्रति लोगों की जागरूकता और हकीकत को बयां करने के लिए काफी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की निदेशक मारिया नीरा ने पिछले महीने दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में ईरान का जालोब शहर दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर माना गया है। इसमें भारत के 10 शहरों के नाम शामिल हैं, जिसमें यूपी के तीन शहरों इलाहाबाद को तीसरा, कानपुर को 15वां और लखनऊ को 18वां स्थान दिया गया है। इसके अलावा ग्वालियर का दूसरा, पटना का चौथा और रायपुर का पंचवा स्थान है। इसलिए लखनऊ में पर्यावरण को लेकर प्रदूषण नियंत्रण विभाग और प्रशासन के साथ स्वास्थ्य विभाग के लोगों ने भी लोगों की सुरक्षा का प्रयास शुरू कर दिया है।
चिकित्सकों के मुताबिक प्रकृति का भयंकर दोहन होने की वजह से जिंदगी जीने के लिए स्वच्छ हवा और पानी की समस्या भयंकर रूप लेती जा रही है। वाहनों से निकलने वाला धुआं इंसान को काफी नुकसान पहुंचा रहा है। इसके निकलने वाला हाइड्रोकार्बन, कार्बन मोनोआक्साइड , नाइट्रोजन आक्साइड और लेड तमाम तरह की गंभीर बीमारियों का कारण बन रहा है। प्रदूषण के कारण दमा, कैंसर, हृदय रोग और मोटापा की समस्या आम होती जा रही है। इन बीमारियों से मरने वाले लोगों की संख्या किसी भी दुर्घटना में मरने वालों की संख्या से कही अधिक होती है।

सांस संबंधी बीमारियों का प्रमुख कारण है प्रदूषण : डॉ. संतोष

किंगजार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय पल्मोनरी विभाग के स्स्कुमार के मुताबिक पर्यावरण में लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है। इस वजह से लोगों में सीओपीडी बीमारी अधिक हो रही है। जो फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारी है। इसमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं। नलियों में सूजन आ जाती है। समय पर इलाज नहीं मिलने पर सूजन निरंतर बढ़ती रहती है। जो आगे चलकर फेफड़े खराब होने का कारण बनता है। सीओपीडी का मुख्य उपचार रिस्क फैक्टर को रोकना है। रिस्क फैक्टर जैसे चूल्हे का धुआं, धूल और प्रदूषण आदि से बचना जरूरी है।

बच्चों में भी तेजी से फैल रही बीमारी: डॉ. मनीष
भाऊराव देवरस चिकित्सालय के बाल रोग विशेषज्ञ डा. मनीष शुक्ला के मुताबिक कीटनाशक दवाओं के प्रयोग से फसल को लाभ होता है लेकिन शरीर को काफी नुकसान पहुंचता है। वातावरण में व्यापक रूप में फैले लेड के प्रभाव से अर्ध-विकसित बच्चों की संख्या बढ़ रही है। इसके अतिरिक्त बच्चों में पेटदर्द और मिचली की शिकायत रहती है। अधिक विषाक्तता के कारण गुर्दे और स्नायु तंत्र को नुकसान पहुंचता है। इस वजह से बच्चों में ‘इन्सेफलाइटिस’ जैसे भयंकर रोग को फैलने का मौका मिल जाता है। इससे बड़ों में पेट दर्द, कब्ज, एकाग्रता में कमी, स्मरण शक्ति की दुर्बलता, अनिद्रा, बेचैनी, चिड़चिड़ाहट एवं तनाव जैसे दुष्प्रभाव सामने आये हैं। उन्होने बताया कि जल हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अवयव है। आज पानी भी बहुत ज्यादा दूषित हो गया है। नदियों में कारखानों का कचरा, शहरों का कचरा एवं अन्य दूषित पदार्थ बहाये जाते हैं। परिणामस्वरूप प्रदूषित पानी पीने से गेस्ट्रोइन्ट्राइटिस, कोलाइटिस, कालरा, दस्त और अनेकों प्रकार की स्किन संबंधी बीमारियां हो रही हैं। ऐसे में मनुष्य को अपनी जीवन शैली में बदलाव लाने की जरूरत है।
भाऊराव देवरस चिकित्सालय के बाल रोग विशेषज्ञ डा. मनीष शुक्ला के मुताबिक कीटनाशक दवाओं के प्रयोग से फसल को लाभ होता है लेकिन शरीर को काफी नुकसान पहुंचता है। वातावरण में व्यापक रूप में फैले लेड के प्रभाव से अर्ध-विकसित बच्चों की संख्या बढ़ रही है। इसके अतिरिक्त बच्चों में पेटदर्द और मिचली की शिकायत रहती है। अधिक विषाक्तता के कारण गुर्दे और स्नायु तंत्र को नुकसान पहुंचता है। इस वजह से बच्चों में ‘इन्सेफलाइटिस’ जैसे भयंकर रोग को फैलने का मौका मिल जाता है। इससे बड़ों में पेट दर्द, कब्ज, एकाग्रता में कमी, स्मरण शक्ति की दुर्बलता, अनिद्रा, बेचैनी, चिड़चिड़ाहट एवं तनाव जैसे दुष्प्रभाव सामने आये हैं। उन्होने बताया कि जल हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अवयव है। आज पानी भी बहुत ज्यादा दूषित हो गया है। नदियों में कारखानों का कचरा, शहरों का कचरा एवं अन्य दूषित पदार्थ बहाये जाते हैं। परिणामस्वरूप प्रदूषित पानी पीने से गेस्ट्रोइन्ट्राइटिस, कोलाइटिस, कालरा, दस्त और अनेकों प्रकार की स्किन संबंधी बीमारियां हो रही हैं। ऐसे में मनुष्य को अपनी जीवन शैली में बदलाव लाने की जरूरत है।

डॉ राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉï. भुवन तिवारी बताते हैं कि बढ़ता प्रदूषण पर्यावरण और मनुष्य दोनों के लिए घातक साबित हो रहा है। प्रदूषण हृदयाघात के साथ ही तनाव का प्रमुख कारण हो सकता है। यह जरूरी नहीं है कि हृदय रोग ‘जीन्स’ का उपहार हो। यह अधिकांशत: पर्यावरण संबंधी कारणों से होता है। इसके लिए वायु प्रदूषण तथा पोषाहार की कमी और अधिकता प्रमुख कारण हो सकते हैं। इसलिए अधिक पोषाहार, धूम्रपान एवं स्थानबद्ध जीवनशैली से बचें। उन्होने बताया कि जो युवा धूम्रपान नहीं करते , नियमित व्यायाम करते हैं। पौष्टिक भोजन लेते हैं। उन युवाओं में भी अचानक होने वाले हृदयघात का खतरा बढ़ रहा है,उसका मुख्य कारण पर्यावरण का प्रदूषित होना है। दूषित वातावरण से शरीर में ऑक्सीजन की कमी होती है। इससे भी दिल पर अधिक दबाव पड़ता है। जो जानलेवा साबित हो रहा है।

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