सांप्रदायिकता के विरुद्ध सच्चाई का संघर्ष

भारत डोगरा
प्राय: यह कहा जाता है कि सांप्रदायिकता की विचारधारा का सामना धर्म-निरपेक्षता की विचारधारा से करना चाहिए। इसकी वास्तव में बहुत जरूरत है। पर अब इससे आगे एक और बात कही जा सकती है कि सांप्रदायिकता के असत्यों का सामना सच्चाई की नैतिकता से करना चाहिए। सच्चाई तो वास्तव में उनके साथ है जो सब समुदायों की समानता और भाईचारे के आधार पर अमन-शांति से जीना चाहते हैं।
सच्चाई तो उनके साथ है जो सब तरह के भेदभाव को समाप्त कर समाज में सबको एक समान इज्जत देना चाहते हैं। ऐसी व्यवस्था हो जाएगी तो कोई बाहरी तत्त्व हिंसा भडक़ाना भी चाहेगा तो वह सफल नहीं हो पाएगा। तभी देश प्रगति कर सकेगा जब उसमें सब की समानता के आधार पर टिकाऊ अमन-शान्ति कायम होगी।
जो सब समुदायों की समानता और न्याय के आधार पर भारत को एक महान देश बनाना चाहते हैं, सच्चाई उनके साथ है तो संविधान भी उनके साथ है। हमारे संविधान निर्माताओं ने हमें ऐसा ही संविधान दिया है जिसने सभी समुदायों की समानता को सुनिश्चित किया है और सब तरह के भेदभाव को समाप्त किया है। जब सच्चाई उनके साथ है और संविधान भी उनके साथ है तो फिर धर्म-निरपेक्षता की ताकतें अपने को कमजोर क्यों महसूस कर रही है? इसकी एक बड़ी वजह यह है कि धर्म-निरपेक्षता की ताकतों ने आपस में व्यापक एकता बना कर निरंतरता से कार्य नहीं किया गया है। अब समय आ गया है कि हम आपसी एकता बना कर सच्चाई को सामने रखें और इसके साथ ही भारतीय संविधान को जमीनी स्तर पर मजबूत करें, उस भारतीय संविधान को जिसे कई मामलों में दुनिया भर में एक आदर्श माना जाता है और जिसने सदियों से चल रहे तरह-तरह के सामाजिक भेदभाव को मजबूती से समाप्त कर आजादी के बाद हमें बहुत अच्छी शुरुआत दी थी। पर सब कुछ कानून से नहीं होता है, इसके लिए जन-अभियान चाहिए, जन-आंदोलन चाहिए। संविधान में सब तरह के सामाजिक भेदभाव को समाप्त कर दिया, पर अब आगे हमारा कत्र्तव्य है कि सब समुदायों की समानता और सब तरह के धार्मिक-सामाजिक भेदभाव के समाप्ति के संदेश को बस्ती-बस्ती तक प्रतिष्ठित करें। तभी सामाजिक न्याय और समानता के आधार पर, सभी समुदायों को बराबर की भागेदारी के आधार पर महान देश बनाने का हमारे संविधान निर्माताओं का सपना पूरा हो सकेगा।
एक बड़ा सवाल हमारे सामने है कि हमने तरक्की करनी है, या छोटे-बड़े कई झगड़ों में फंस कर रह जाना है। यदि तरक्की करनी है तो आलतू-फालतू के सब झगड़ों को छोडऩा होगा। अमन-शान्ति वह बुनियाद है जो अगर मजबूती से तैयार की जाए तो फिर आगे तरह-तरह की प्रगति की संभावनाएं अपने आप खुलने लगती हैं। वही देश और समाज सबसे संतुलित और टिकाऊ प्रगति करते हैं जिनमें सभी समुदायों व लोगों के लिए किसी भेदभाव के बिना प्रगति के दरवाजे खुले होते हैं क्योंकि तब सभी लोग अपनी क्षमताओं को भली-भांति विकसित कर देश व समाज की प्रगति में अपना भरपूर योगदान दे सकते हैं। दूसरी ओर जिन समाजों व देशों में विभिन्न नागरिकों को धर्म, जाति, रंग, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है, वहां प्रगति की न्यायसंगत बुनियाद तैयार नहीं हो पाती है।
सब धर्मों व समुदायों की समानता न्याय की मांग है, प्रगति की मांग है, समानता की मांग है, संविधान का संदेश है। अत: सांप्रदायिकता का विरोध करना बहुत जरूरी है बल्कि यदि सच कहें तो भारतीय संविधान की रक्षा के लिए सांप्रदायिकता का विरोध करना जरूरी है। सांप्रदायिकता में कट्टरता की सोच केवल किसी एक धर्म से नहीं जुड़ी है अपितु कुछ कम या कुछ अधिक यह सांप्रदायिकता की सोच दुनिया के सभी मुख्य धर्मों से जुड़ी रही है। यह अलग बात है कि विभिन्न समय व स्थान में कोई विशेष तरह की सांप्रदायिकता हावी होती है। हमें चाहिए कि सभी तरह की सांप्रदायिकता और कट्टरता के प्रति अपना विरोध प्रकट करें, हालांकि अधिक संघर्ष तो उस सांप्रदायिकता के विरुद्ध करना होगा जो हमारे समय व स्थान में हावी है।
सांप्रदायिकता का अर्थ है किसी दूसरे धर्म या धर्मों के प्रति नफरत फैलाना या उनका अपमान करना या उनके विरुद्ध हिंसा करना। इस तरह की जो भी सांप्रदायिक सोच व कार्यवाही है, उसका विरोध करना जरूरी है। यह इंसानियत की मांग है, भाई चारे की मांग है, पर इसके साथ ही यह देश की प्रगति के लिए भी जरूरी है। सांप्रदायिकता रुकेगी तभी अमन-शांति स्थापित होगी, तभी टिकाऊ प्रगति का आधार तैयार होगा। पर सांप्रदायिकता के विरोध में सावधानी बरतना जरूरी है ताकि किसी के धर्म की मूल मान्यताओं पर कोई चोट न हो। सांप्रदायिकता के विरोध का यह अर्थ कतई नहीं है कि किसी के धर्म का विरोध हो। भारतीय संविधान ने सभी को अपनी धार्मिक मान्यताओं का पूरा हक दिया है। अत: सांप्रदायिकता के विरोध के समय में हमें यह ध्यान रखना होगा कि हम किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत न करें। हमारा संदेश यह होना चाहिए कि सभी धर्मों का सम्मान करते हुए हम एक महान देश बनाएं जो दुनिया भर में आपसी भाईचारे और अमन-शांति की मिसाल बने।
जिस तरह देश में सभी धर्मों की आजादी और समानता है, वैसे ही जो किसी धर्म या ईश्वर को जो नहीं मानते हैं, उन्हें भी आजादी और समानता का माहौल मिलना चाहिए। शहीद भगतसिंह और उनके अनेक प्रिय साथी नास्तिक थे, पर महान देशभक्तों व स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में उन्हें हम उच्चतम सम्मान देते हैं।

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