सवालों के घेरे में चिदंबरम

मंत्रालय के सचिव पिल्लई ने खुलासा किया है कि दूसरा हलफनामा खुद चिदंबरम ने लिखवाया। इसी कार्यकाल में गृह मंत्रालय के एक और पूर्व अफसर आरवीएस मणि ने आरोप लगाया है कि यूपीए सरकार के दौरान इशरत को आतंकी नहीं बताने को लेकर उन पर दबाव डाला गया था।

sanjay sharma editor5पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम इन दिनों मुश्किलों में फंसते दिख रहे हैं। चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम पर वित्तीय हेराफेरी का आरोप लगा है। कार्ति के जरिए ही पूर्व वित्त मंत्री कटघरे में खड़े हो रहे हैं। मामला तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव की वजह से खूब उछाला जा रहा है। तमिलनाडु में कांग्रेस और द्रमुक का गठजोड़ है, इसलिए कार्ति के मामले को जोर-शोर से उठाने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी अन्नाद्रमुक ले रही है।
चिदंबरम के गृहमंत्री रहते मंत्रालय के सचिव रहे गोपाल पिल्लई के खुलासे के बाद कि इशरत जहां मामले में सरकार का हलफनामा खुद चिदंबरम ने बदलने को मजबूर किया था। उन्हें और भी मुसीबत में डालता दिख रहा है। जून 2004 में अहमदाबाद में इशरत जहां और उसके तीन साथी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे। आरोप लगा कि यह मुठभेड़ फर्जी थी। मामले की जांच हुई और अभियोजन भी शुरू हुआ। गुजरात पुलिस के सात अधिकारियों को जेल भेजा गया। साल 2009 में केंद्र सरकार ने अदालत में जो पहला हलफनामा दिया था उसमें इशरत को आतंकी कहा गया था। लेकिन एक दूसरे हलफनामे में इशरत के लश्कर-ए-तयैबा से जुड़े होने के उल्लेख हटा दिए गए।
मंत्रालय के सचिव पिल्लई ने खुलासा किया है कि दूसरा हलफनामा खुद चिदंबरम ने लिखवाया। इसी कार्यकाल में गृह मंत्रालय के एक और पूर्व अफसर आरवीएस मणि ने आरोप लगाया है कि यूपीए सरकार के दौरान इशरत को आतंकी नहीं बताने को लेकर उन पर दबाव डाला गया था। इतना ही नहीं हलफनामा बदलने का निर्देश भी दिया गया। मणि ने ये भी बताया कि इस सब के लिए एसआईटी के मुखिया ने उन्हें सिगरेट से दागा और सीबीआई उनका पीछा करती थी। सरकारी गवाह बन चुके डेविड हेडली ने भी गवाही में भी इशरत के लश्कर से संबंधों की बात कही है। जाहिर है, इन खुलासों ने चिदंबरम को तो सांसत में डाल दिया है। इस तरह कांग्रेस सदन में बचाव की मुद्रा में नजर आई।
सवाल है कि पिल्लई और मणि अब तक चुप्पी क्यों साधे रहे? कांग्रेस का यह पलटवार कि पिल्लई को अडाणी की कंपनी से जुडऩे के साढ़े छह साल बाद इसका खुलासा क्यों किया, इसका खुलासा पहले करना चाहिए था। इतना तो साफ है कि सीबीआई गृह मंत्रालय के मातहत होने के कारण तत्कालीन गृहमंत्री के दबाव में रही होगी।
ऐसे में सवाल यह है कि हमारे नेता और जांच एजंसियों का कितना भरोसा किया जाए। पर हां, पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम की छवि इस मामले से जरूर धूमिल हो गई है।

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