सलमान की जमानत पर जनहित याचिका दायर

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureनोएडा। सलमान खान को मिली जमानत खारिज कर उन्हें जेल भेजे जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। यह याचिका मीडिया पोर्टल भड़ास फॉर मीडिया के संपादक यशवंत सिंह की तरफ से अधिवक्ता उमेश शर्मा ने दाखिल की है।
याचिका डायरी नंबर 16176 / 2015 है। जनहित याचिका के माध्यम से इस बात को अदालत के सामने लाया गया है कि सेशन कोर्ट बॉम्बे ने इस मामले में पहले से निर्देशित कानून का पालन जानबूझ कर नहीं किया जिसकी वजह से सलमान खान को आराम से जमानत मिल गयी। उमेश शर्मा के मुताबिक सलमान खान को जमानत मिलने के कारण भारत के पढ़े-लिखे लोग सन्न हैं और हर तरफ कोर्ट पर सवाल उठाए जाने लगे हैं। सोशल मीडिया पर कोर्ट के खिलाफ नकारात्मक टिप्पणियों की बाढ़ सी आ गई। लोग सवाल उठाने लगे हैं कि क्या किसी अदृश्य और बड़ी राजनीतिक ताकत के इशारे पर न्यायपालिका सिर के बल पलट गई और ऐसे-ऐसे कारनामे किए कि न्यायपालिका पर से लोगों का भरोसा उठ जाए। यह प्रश्न मूल रूप से उठाया गया है कि क्या कानून सभी के लिए बराबर है? अगर ऐसा है तो सेशन कोर्ट के जज साहब ने एक दिन में ही दोनों आदेश क्यों पारित किये जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 1989 में ही कहा था कि ऐसे मामलों में अदालत को दोनों आदेश दो दिनों में पारित करने चाहिये।
सेशन कोर्ट के जज साहब के ऐसा करने की वजह से आर्डर की कॉपी उसी दिन उपलब्ध नहीं हो सकी और हाई कोर्ट ने इसी तर्क के आधार पर जमानत दे दी। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब जान बूझ कर किया गया और उनको फायदा पंहुचा दिया गया। सेशन कोर्ट के जज साहब शाम को सात बजे तक अपने द्वारा जान बूझ कर की गई गलती से सृजित होने वाले बेल आर्डर का इंतजार क्यों करते रहे और क्या उन्होंने ऐसा पहले कभी किया है। क्या हाई-कोर्ट बिना फैसले की कॉपी के अपील सुन सकता है और सजा टाल सकता है? कोई भी अपील हाई कोर्ट के सामने बिना फैसले की कॉपी को सलंग्न किए बिना अदालत के सामने रखी ही नहीं जाती है तो इसमें ऐसा क्यों किया गया और क्या पहले ऐसा किया गया है और क्या आगे ऐसा किया जायेगा? क्या हाई कोर्ट सलमान खान की अपील को 15 जुलाई को फैसले के लिये भेज सकता है और इस बात की परवाह किये बिना कि हजारों अपीलें लाइन में लगी हैं और उनके आरोपी जेलों में बंद हैं। क्या अदालतें जो समानता का अधिकार दिलवाती हैं वो खुद समानता के अधिकार का हनन कर सकती हैं। जनहित याचिका के साथ सोशल मीडिया में न्यायालय के खिलाफ की गईं नकारात्मक टिप्पणियों की प्रति भी संलग्न की गई है ताकि कोर्ट आइना देख सके।

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