सरकारी स्कूलों के सुधार की कवायद

लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने से परहेज करने लगे हैं तो इसका कारण सरकारी तंत्र है। प्राथमिक स्कूलों की दुर्दशा पर हाइकोर्ट ने भी सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने कहा है कि जनप्रतिनिधि, उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों और न्यायाधीशों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे तब तक इसकी दशा नहीं सुधरेगी।

sanjay sharma editor5उत्तर प्रदेश में प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। स्कूलों की स्थिति सुधारने की कवायद बहुत सालों से हो रही है पर सुधार की जगह स्थिति और बद्तर होती जा रही है। कहीं अध्यापक हैं तो छात्र नहीं, जहां छात्र अधिक हैं तो वहां अध्यापक पर्याप्त नहीं हैं। कई स्कूलों पर तो सालों से ताला पड़ा है। सरकार भी सुधार में कोई रुचि नहीं दिखा रही है। स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए प्रति वर्ष योजनाएं तो बहुत संचालित की जाती हैं पर जो मूलभूत समस्या है, उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

प्रदेश के एक लाख 40 हजार प्राथमिक व दो लाख 70 हजार जूनियर स्कूलों में अध्यापकों के पद रिक्त पड़े हैं। सरकार ने कुछ रिक्तियों को भरने के लिए पहल की भी तो वह भी तीन साल से सरकार के ढुलमुल रवैये की वजह से नहीं हो पाया है। और रही सही कसर मिड-डे मील ने पूरी कर दी है। आए दिन दोपहर के भोजन में कुछ न कुछ समस्या लगी रहती है। आज स्कूलों की हालत ऐसी हो गई है कि थोड़ा भी सक्षम आदमी अपने बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में दाखिला कराने से परहेज करता है। गिने-चुने बच्चे स्कूल जाते है तो वह भी दोपहर के भोजन और वजीफे की वजह से। हालत ऐसी हो गई है कि अनपढ़ लोग तक यह कहते हैं कि स्कूल भेजने से क्या फायदा। वहां पढ़ाई तो होती नहीं। स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता का संकट तो है ही साथ ही व्यवस्था के लचर रवैये ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है।

लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने से परहेज करने लगे हैं तो इसका कारण सरकारी तंत्र है। प्राथमिक स्कूलों की दुर्दशा पर हाइकोर्ट ने भी सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने कहा है कि जनप्रतिनिधि, उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों और न्यायाधीशों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे तब तक इसकी दशा नहीं सुधरेगी। हाइकोर्ट ने छह माह के भीतर मुख्य सचिव को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि सरकारी कर्मचारियों के बच्चे अनिवार्य रूप से बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में पढ़ें। ऐसा न करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों के बच्चों के न पढऩे की वजह से ही सरकारी स्कूलों की इतनी दुर्दशा है।

हाईकोर्ट के इस फैसले से एक उम्मीद जगी है कि यदि यह नियम लागू हो गया तो निश्चित ही सरकारी स्कूलों की कायाकल्प होगा। अगर यह नियम लागू हो गया तो सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।

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