सरकारी दावे कुछ और, हकीकत कुछ और

 देवांशु वत्स
पिछले 69 साल से विकास और समृद्धि के जो दावे किए जा रहे हैं, उसके दो रूप आज सामने हैं और दोनों में गजब का विरोधाभास है, सरकार कहती है कि विकास हुआ है उसके लिए उसके पास आंकड़े हैं जिनकी बाजीगरी दिखाकर वह लोगों को लगातार बहलाती रही है। दूसरी तरफ सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य व भोजन जैसी मूलभूत जरूरतों से वंचित लोगों की संख्या देश में अभी भी अच्छी खासी है। देश में करीब बीस करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके पास रेडियो, ट्रांजिस्टर, टीवी या किसी भी तरह का वाहन नहीं है। 36.8 फीसदी घरों में किसी तरह का फोन नहीं है न लैंडलाइन और न मोबाइल। किसी भी तरह का वाहन तो रोजमर्रा के जीवन के लिए जरूरी है। करीब आधे भारतीयों के पास किसी भी तरह का वाहन नहीं है। विकास के लिए आए दिन सरकारी योजनाएं बनती हैं। कितनी कागजों पर ही रह जाती हैं और कितनी क्रियान्वित हो पाती हैं, इसका लेखा-जोखा रखने का काम नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) का है। हालांकि यह एक सरकारी विभाग ही है और उसके आकलन थोड़ी बहुत राजनीतिक उथल-पुथल मचाने के बाद ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।
एक आकलन है कि देश में अवैध खनन का कारोबार एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का है। विदेशी बैंकों में जमा काले धन की मात्रा का तो अभी तक ठीक से अनुमान भी नहीं लगाया जा सका है। घोटालों और उस पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति, सफाई और थोड़े शोर शराबे के बाद सब कुछ दबा दिए जाने की परंपरा ने कभी यह सुनिश्चित ही नहीं होने दिया है कि पैसा कहां से आया और कहा चला गया। 69 साल में जवाबदेही किसी ने स्वीकार नहीं की है। देश चल रहा है और विकास हो रहा है, सब यही मानकर मगन हैं। नेताओं की वैध-अवैध संपत्ति फल फूल रही है और दावा किया जा रहा है कि आम आदमी का जीवन स्तर सुधर रहा है, उसके लुभावने आंकड़े जुटाने और उन्हें चमकदार तरीके से परोसने में पूरी सरकारी मशीनरी लगी हुई है।
लेकिन विकास कहां हुआ है इसकी पोल खुल जाती है आंकड़ों और सरकारी अध्ययनों से ही निकली जानकारी से। बुनियादी सुविधाओं की ही बात लें तो 2005 में गांव-गांव में बिजली पहुंचाने के लिए 27 हजार करोड़ रुपए की ग्रामीण विद्युतीकरण योजना शुरू की गई थी। दावा किया गया है कि 87 फीसदी गांव रोशन हो गए हैं। असलियत यह है कि देश के 11 लाख घरों में बिजली नहीं है बिहार के तो दस फीसदी गांवों में ही बिजली है। देश के 43 फीसदी ग्रामीण घरों में आज भी रोशनी के लिए लालटेन या कठकी का इस्तेमाल होता है। 85 फीसदी गांवों में खाना पकाने के लिए लकड़ी, फसल के अवशेष और उपलों को जलाया जाता है।
रही पानी की बात तो बीस फीसदी भारतीयों को पीने का साफ पानी नहीं मिलता। 22 फीसदी ग्रामीण आबादी को पानी के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालाय ने भी इसे सबसे बड़ी समस्या माना है कि आधे से ज्यादा परिवारों को शौच के लिए खुले में जाना पड़ता है। झारखंड, ओडीशा और छत्तीसगढ़ में तो ऐसे परिवारों की संख्या वहां की आबादी को दो तिहाई है।
दलितों और आदिवासियों के उत्थान के दावे किए जाते हैं और उन दावों के आधार पर सालों से वोट बटोरे जा रहे हैं। 2010-2011 में दलितों के लिए 23153 करोड़ और आदिवासियों के लिए 9221 करोड़ रुपए आवंटित हुए यह तो खर्च का हिसाब है लेकिन सरकारी लापरवाही की वजह से विभिन्न योजनाओं के तहत पहुंचने वाले 25274 करोड़ रुपए दलितों तक और 18004 करोड़ रुपए आदिवासियों तक पहुंच ही नहीं पाए। 2011-2012 में तो दलित 23890 करोड़ और आदिवासीय 12.87 करोड़ रुपए की मदद से वंचित रह गए। वजह जिन मंत्रालयों और विभागों को अपने कुल खर्च का जो हिस्सा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण पर अनिवार्य रूप से लगाना था, उसका उन्होंने समय पर आवंटन ही नहीं किया। इसी का नतीजा है कि गांवों में अनुसूचित जनजाति के 47.4 फीसदी और अनुसूचित जाति के 42.3 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।
और गरीबी रेखा भी क्या है। जून 2011 में योजना आयोग ने गांवों में प्रति व्यक्ति 26 रुपए और शहरों में 32 रुपए रोज को गरीबी रेखा मानक मानने का हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में दिया था। इस पर काफी बवाल भी मचा था। गरीबी की नई हास्यास्पद परिभाषा भी की गई है जिसके मुताबिक गांव का एक व्यक्ति 22.43 रुपए रोज 672.8 रुपए मासिक और शहरी व्यक्ति 28.65 रुपए (859.6 रुपए मासिक) में मजे से गुजारा कर सकता है। सरकारी दावा है कि 2004-05 से 2009-10 के बीच के पांच सालों में गरीबों की संख्या 7.3 फीसदी घटकर 37.2 फीसदी से 29.8 फीसदी रह गई है। इस अरसे में गांवों में गरीब आठ फीसदी कम होकर 41.5 फीसदी से 33.8 फीसदी तक आ गए। लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि सिर्फ बिहार और उत्तर प्रदेश में बारह करोड़ 80 लाख गरीब हैं जो देश की कुल गरीबों की संख्या का एक तिहाई है।
शिक्षा पर 2009 से 2012 के बीच बजट दुगुना कर दिया गया है। 2009-2010 में प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए 26169 करोड़ रुपए आंवटित थे। जो 2011-12 में 55746 करोड़ रुपए हो गए यानी हर बच्चे पर 4269 रुपए। लेकिन छात्रों तक पहुंच पाया है इसका छह फीसदी हिस्सा ही। ये तो सिर्फ कुछ उदाहरण हैं। लालफीताशाही, अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार की वजह से विकास योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। ऐसे में विकास होगा तो कैसे?

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