समाजवादियों की सरकार में पूंजीवादियों की जय जयकार…

पैसे के आगे सब कुछ बौना हो जाता है। सभी को लगने लगता है कि पूंजी ही असली सत्य है बाकी सब बेमानी है। सबकी दौड़ पूंजी हासिल करने में लग जाती है। कोई यह नहीं सोचना चाहता कि पूंजी किस तरह हासिल हुई.

 

sanjay sharma editor5सपा सरकार अब तक मोदी सरकार पर हमला बोलती रहती थी कि वो पूंजीपतियों की हितैषी है। लगता भी था क्योंकि सपा के नेता हमेशा गरीबों के समाजवादियों के जुमले बोलते रहते थे। जब विधान परिषद में चयन का मामला आया तब भी लगा कि किसी गरीब मगर साहित्य या अन्य किसी कला में माहिर व्यक्ति को ही उच्च सदन में भेजा जायेगा। मगर जब समाजवादियों की सरकार ने सूची फाइनल की तो सबसे ऊपर नाम बिल्डर संजय सेठ का था। आखिर समाजवादियों के साथ बिल्डर का यह कौन सा प्यार है जो निष्ठावान कार्यकर्ताओं को पीछे छोड़ देता है यह कोई नहीं समझ सका। सरकार चाहे कोई भी हो, हर सरकार में चलती सिर्फ पूंजीपतियों की है यह एक बार फिर साबित हो गया।
इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है पूंजी की ताकत में निष्ठा कहीं खो जाती है। पैसे के आगे सब कुछ बौना हो जाता है। सभी को लगने लगता है कि पूंजी ही असली सत्य है बाकी सब बेमानी हैं। सबकी दौड़ पूंजी हासिल करने में लग जाती है। कोई यह नहीं सोचना चाहता कि पूंजी किस तरह हासिल हुई। सबकी सोच सिर्फ अपने पास पूंजी के ढेर लगाने की हो जाती है और इसके आगे बाकी सबका कोई मतलब नहीं रह जाता। क्या राजनेताओं को एक पल भी नहीं लगता होगा कि इतनी पूंजी कोई शख्स कैसे जुटा लेता है। कोई उसके बारे में जानना भी नहीं चाहता, बस सब एक ऐसी दौड़ में शामिल हैं जिसका कोई अंत नहीं।
मुलायम सिंह यादव जमीन से जुड़े नेता हैं। उन्होंने अपने जीवन में गरीबी के दिन भी देखे हैं। मामूली किसान से शुरू हुआ उनका जीवन संघर्षों की दास्तान है। वो हर उस आदमी को पसंद करते थे जो संघर्ष का रास्ता तय करके आया था। उस शख्स को आगे बढ़ाते थे जिसने मेहनत की हो। फिर आखिर अब क्या हो गया कि सैकड़ों कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें एक बिल्डर अच्छा लगा। आखिर वो कौन सी परिस्थिति थी जिसमें कार्यकर्ता और बिल्डर के चुनाव में बिल्डर भारी पड़ गया।
संजय सेठ सिर्फ एक नाम ही नहीं है। वो एक मिसाल है कि आदमी कैसे हर सरकार को इस्तेमाल करते हुए हर सीढ़ी चढ़ता चला जाता है। बेशक उसने पूंजी के ढेर इकट्ठे कर लिए हों पर उस पूंजी में कई कलंक कथायें भी जुड़ीं हैं। सैकड़ों करोड़ के ठेके लेने के लिए किन-किन अफसरों और राजनेताओं को घूस देनी पड़ती है यह किसी से छिपा नहीं है। तो क्या माना जाये कि इन मापदंडों पर खरा उतरा व्यक्ति इतनी काबिलियत हासिल कर लेता है कि वो सबसे बड़े सदन में बैठ सकता है। बेशक उच्च सदन में उस व्यक्ति को बैठना चाहिए जो समाज में लोगों के लिए प्रेरणा बन सके। तो क्या अब संजय सेठ लोगों के लिए प्रेरणा बनेंगे?

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