समस्या असहिष्णुता के प्रति सहिष्णुता की है

अवधारणा का अनुसरण मत या पंथ के रूप में विकसित हुआ है। भारत में पंथ प्रपंच न था न है, कुछेक ईष्यालुओं को छोडक़र सभी पंथों या मतों के प्रतिपादकों ने ईश्वर प्राप्ति के लिए मार्ग बताते हुए यह कभी नहीं कहा कि दूसरे पंथहीन हैं या केवल उन्हीं का पंथ एकमात्र मार्ग है। हिन्दुत्व या भारतीयत्व का तात्पर्य ही है समरसता। सर्वधर्म सम्भाव के रूप में इसे अनादिकाल से कहा ही नहीं जा रहा है अपितु पंचायतन मंदिर के रूप में या सनातन परम्परा से पृथक अस्तित्व का बोध कराने वाले जैन और बौद्धमत की समरसता का स्वरूप उसका प्रमाण भी है। विश्व में जो भी उत्पीडि़त हुआ वह भारत में आकर बस गया। भारत ने उसकी निष्ठा का सदैव आदर किया।

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने कहा है कि समस्या यह नहीं है कि हम असहिष्णु हैं, समस्या यह है कि हम असहिष्णुता प्रति भी अत्याधिक सहिष्णु हैं। सेन ने एडीटर्स गिल्ड द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में सहिष्णुता और असहिष्णुता के संदर्भ में यह भी कहा कि हम जो हिन्दू हैं उन्हें किसी अन्य आस्था से कोई परेशानी नहीं है। पिछले दिनों सहिष्णुता और असहिष्णुता के संदर्भ भारत में मचे कोलाहल से जो वातावरण बना है उसमें अमृत्य सेन ने हिन्दुओं में गहराई तक पैठ बनाए हुए अन्य मतों के प्रति जिस सहिष्णुता की अवधारणा का उल्लेख किया है, उसी अवधारणा का पुनर्जागरण अभियान असहिष्णुता का सबसे ज्यादा शिकार बनाया गया है।
अवधारणा का अनुसरण मत या पंथ के रूप में विकसित हुआ है। भारत में पंथ प्रपंच न था न है, कुछेक ईष्यालुओं को छोडक़र सभी पंथों या मतों के प्रतिपादकों ने ईश्वर प्राप्ति के लिए मार्ग बताते हुए यह कभी नहीं कहा कि दूसरे पंथहीन हैं या केवल उन्हीं का पंथ एकमात्र मार्ग है। हिन्दुत्व या भारतीयत्व का तात्पर्य ही है समरसता। सर्वधर्म सम्भाव के रूप में इसे अनादिकाल से कहा ही नहीं जा रहा है अपितु पंचायतन मंदिर के रूप में या सनातन परम्परा से पृथक अस्तित्व का बोध कराने वाले जैन और बौद्धमत की समरसता का स्वरूप उसका प्रमाण भी है। विश्व में जो भी उत्पीडि़त हुआ वह भारत में आकर बस गया। भारत ने उसकी निष्ठा का सदैव आदर किया। जहां भारत में प्रतिभूत किसी भी पंथ ने यह दावा नहीं किया कि उसके अलावा दूसरा कोई पंथ ईश्वर प्रति में सक्षम नहीं है। वहीं ईसाई और इस्लाम धर्म की मान्यता है कि मनुष्य का उद्धार ईसा मसीह या मोहम्मद साहब के बताये मार्ग से ही संभव है।
भारत की सर्व धर्म सम्भाव अवधारणा के अनुरूप सभी का आचरण है, ऐसा तो दावा कोई नहीं कर सकता है लेकिन भारत में वाह्य दर्शनों में जो विभाजन और स्व के अतिरिक्त आस्थाओं के प्रति दुर्भावना है, वैसा ‘दर्शन’ नहीं है। अम्तर्य सेन जब यह कहते हैं कि भारत में असहिष्णुता नहीं अपितु असहिष्णुता के प्रति अतिशय सहिष्णुता ही समस्या है तो उसका संदर्भ क्या हो सकता है? भारत का स्वभाव आक्रमणकारी का नहीं है। अपनी मान्य सीमा का उसने कभी उल्लंघन नहीं किया, बल्कि उसकी ही सीमाएं सीमित होती रहीं आज भी सीमित ही नहीं खण्ड-खण्ड करने की आवधारणा मुखरित हो रही है। ऐसे में अर्मत्य सेन का कथन असहिष्णुता के प्रति अतिशय सहिष्णुता ही समस्या है, का क्या तत्पर्य समझा जाये क्योंकि उन्होंने स्वयं कभी यह कहा था कि यदि अमुक व्यक्ति प्रधानमंत्री बन गया तो वे भारत नहीं आयेंगे। भारत में लोकतंत्र है, लोकतंत्र में अवाम जिसे सत्ता चलाने का जनादेश देता है, उसके प्रति असहिष्णुता का अभियान चलाना किस सहिष्णुता का प्रतीक है? एक ही प्रकार की घटनाओं को जाति या संप्रदाय के आधार पर अलग-अलग नजरिए से देखना, कहीं जाकर मातम करना और कहीं निगाह उठाकर भी न देखना और सबके साथ समान व्यवहार का हामीकार होकर उसके अनुरूप आचरण करने वाले को सबसे बड़ा असहिष्णु साबित करने में ही सारी क्षमता को स्वाहा कर देने वालों की जमात के ऊपर क्या अमर्त्य सेने के उपदेश का कोई असर होगा।

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