सदभाव का संदेश देकर गया आखिरी बड़ा मंगल

शहर के हर चौराहे पर लगे भण्डारे मंदिरों पर लगा श्रद्धालुओं का तांता

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

Captureलखनऊ। ‘बडा मंगल’ जैसा की नाम से ही अहसास हो जाता है कि इस मंगल में कुछ खास है। जी हां यह मंगल खास है सदभाव के लिये, आपसी भाई चारे के लिये, हिन्दू मुस्लिम एकता के लिये और सभी हनुमान भक्तों के लिये। आज का मंगलवार इसलिये भी अहम है क्योंकि यह इस साल का आखिरी मंगल है। जिसको लेकर पूरे शहर भर में काफी चहल पहल देखी गई जगह जगह भण्डारों का आयोजन किया गया जिसमें जाति धर्मों की दीवार को पाटते हुए सभी ने प्रसाद ग्रहण किया।
राजधानी में ज्येष्ठ मास में पडऩे वाले सभी मंगल को ‘बड़े मंगल’ के रूप में मनाया जाता है। यह आयोजन समाज में सदभाव की एक अलग और अनूठी छटा बिखेरता है। जहां जरा जरा सी बात पर आज लोग मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। वहीं दूसरी ओर बड़े मंगल के इस आयोजन को क्या हिन्दू और क्या मुस्लिम दोनों ही समुदायों के लोग बढ़-चढक़र हिस्सा लेते हैं। इसके साथ ही इस आयोजन में अन्य धर्मों के लोग भी अपनी मौजूदगी दर्शाते हैं।
मंगलवार के इस आयोजन के पूरे दिन लखनऊ के हर गली मोहल्ले में जय हनुमान के जयकारे गूंज उठते हैं। बड़े मंगल को धूमधाम से मनाने की परंपरा की शुरुआत लगभग 400 वर्ष पूर्व मुगल शासक ने की थी। कहा जाता है कि नवाब मोहमद अली शाह का बेटा एक बार गंभीर रूप से बीमार हुआ। उनकी बेगम रूबिया ने उसका कई जगह इलाज कराया लेकिन वह ठीक न हो सका। तब आखिरकार थक हारकर मां अपने बेटे की सलामती की मन्नतें मांगने अलीगंज के पुराने हनुमान मंदिर गईं। जहां पर उनकी मुलाकात वहां के पुजारी से हुई। पुजारी ने बेटे की हालत देख उसे मंदिर में ही छोड़ देने को कहा। जिस पर रूबिया बेटे को एक दिन के लिये मंदिर में ही छोड गईं। दूसरे दिन जब रूबिया अपने बेटे को लेने आई तो उसे तरह से स्वस्थ पाया। उन्हें इस बात पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि जिस बेटे की हालत इतनी नाजुक थी वो पूरी तरह से स्वस्थ कैसे हो गया। तब रूबिया ने इस पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ ही मुगल शासक ने उस समय ज्येष्ठ माह में पडऩे वाले सभी मंगल को प्रसाद बंटवाया और प्याऊ लगवाये थे। तभी से इस बड़े मंगल की परंपरा की नींव पड़ी।

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