सत्ता के लिए गलबहिया

सपा छोडऩे के बाद बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम सिंह यादव और सपा के खिलाफ जिस तरह से जहर उगला था, उसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में सालों तक हुई थी। लेकिन कल जब बेनी ने सपा का दामन थामा तो ऐसा लगा जैसे उनके और मुलायम के बीच कभी कोई फासला ही न रहा हो। मुलायम सिंह, बेनी की तारीफों के पुल बांधने में जुटे थे और बेनी, मुलायम के।

sanjay sharma editor5एक बात तो सच है कि राजनीति में न कोई दोस्त होता है और न ही दुश्मन। कब कौन दोस्त, दुश्मन बन जाए और कोई दुश्मन, दोस्त बन जाए, कहा नहीं जा सकता। यदि यह कहा जाए कि नेता सिर्फ और सिर्फ सत्ता की लालसा में दोस्त और दुश्मन बनाते हैं तो गलत नहीं होगा। एक दौर में मुलायम सिंह के सबसे करीबी रहे बेनी प्रसाद वर्मा ने फिर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है। वह पहले भी सपा में रहे, लेकिन मुलायम सिंह से मनमुटाव की वजह से साल 2007 में सपा छोड़ दी थी। सपा छोडऩे के बाद बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम सिंह यादव और सपा के खिलाफ जिस तरह से जहर उगला था, उसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में सालों तक हुई थी। लेकिन कल जब बेनी ने सपा का दामन थामा तो ऐसा लगा जैसे उनके और मुलायम के बीच कभी कोई फासला ही न रहा हो। मुलायम सिंह, बेनी की तारीफों के पुल बांधने में जुटे थे और बेनी, मुलायम के। ऐसा प्रेम राजनीति में अक्सर देखने को मिलता है।
कुछ समय पहले तक बेनी, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया व उपाध्यक्ष राहुल के कसीदे पढ़ते नहीं थक रहे थे और आज सपा के कसीदे पढ़ रहे हैं। सपा छोडऩे के बाद बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम सिंह पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। बेनी ने जब कांग्रेस का दामन थामा था तो उसके बाद वह लगातार मुलायम पर हमलावर रहे थे। साल 2007 में जब उन्होंने सपा को छोड़ा था तब अमर सिंह का सपा में रुतबा चरम पर था। इस दौरान बेनी वर्मा, आजम खान और रेवती रमण सिंह हाशिए पर थे। सपा छोडऩे के पीछे एक बड़ा कारण था विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट बांटने पर बेनी से राय न लेना। दरअसल गोण्डा, बाराबंकी, श्रावस्ती, बलरामपुर जिलों में बेनी को ताकतवर माना जाता है। इन सीटों के लिए टिकट बांटने में बेनी प्रसाद वर्मा की राय नहीं ली गई थी। इसके अलावा बेटे को टिकट न मिलने के कारण बेनी भडक़ गए थे। 2007 में बेनी प्रसाद वर्मा अपने बेटे राकेश के लिए टिकट चाहते थे। अमर सिंह की वजह से राकेश वर्मा को टिकट नहीं मिल सका था। बेनी ने इस पर सपा छोडक़र समाजवादी क्रांति दल बनाया लेकिन साल 2008 में वह कांग्रेस में शामिल हो गए थे। वर्तमान में कांग्रेस में भी कहीं न कहीं बेनी हाशिए पर थे, लिहाजा फिर से सत्ता की चाह और महत्व के लिए सपा के खेमे में आ गए। वर्तमान में नेताओं में पार्टी के सिद्धांत के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। उन्हें जहां व्यक्तिगत लाभ दिखता है गलबहिया कर लेते हैं।

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