सड़ांध में डूबी देश की अपराध न्याय-प्रणाली

बलात्कार के अपराध में दस साल की सजा काटने के बाद सन 2014 में जेल से वापस लौटे एक 30 वर्षीय युवक ने पिछले हफ्ते फिर एक 12 साल की बच्ची से बलात्कार किया और फिर उसकी हत्या करके लाश बगल के जौनपुर जिले की एक वीरान जगह पर फेंक दी। कॉल डिटेल्स के आधार पर जब पुलिस ने घटना स्थल के पास के एक पेट्रोल पंप का सीसीटीवी फुटेज देखा तो उसमें इस युवक को पेट्रोल भरवाते पाया। और तब बच्ची की मां द्वारा किया गया शक पुख्ता हो गया। सख्ती से पूछ-ताछ हुई तो युवक ने अपराध कबूल किया। बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। जब पुलिस ने यह जानना चाहा कि बलात्कार के बाद उसने बच्ची की हत्या क्यों की तो उसका जवाब चौंकाने वाला था। उसने कहा कि पिछली बार जब उसने बलात्कार किया था तो लडक़ी जिन्दा रह गयी थी और फिर उसके बयान के आधार पर ही इस युवक को दस साल की सजा हुई थी। इस बार वह यह गलती न हो इसलिए उसने न केवल इस बच्ची को बलात्कार के बाद गला दबा कर मार दिया बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह कहीं जिन्दा न बचे, चाकू से उसका गला भी रेत दिया।

यह घटना अपराध न्याय प्रणाली की सड़ांध बताती है। भारत में जिस सिद्धांत पर अपराध-न्याय प्रणाली काम करती है उसे सुधारवादी न्याय कहा जाता है। यानी अपराधी को राज्य या समाज सजा इसलिए देता है कि वह अपने में सुधार कर सके। जेल में भी उसे इसी भाव से रखा जाता है। लेकिन इस मामले में ठीक उल्टा हुआ। यह अपराधी जेल में भी इस बात से परेशान था कि अगर उसने बलात्कार की शिकार लडक़ी को जिन्दा न छोड़ा होता तो वह बच जाता। लिहाज़ा सजा काटने के बाद उसने सुधार तो किया लेकिन अपने में नहीं बल्कि अपने अपराध करने के तरीके में. उसे यह भी मालूम था कि निर्भया काण्ड के बाद देश का कानून और सख्त कर दिया गया है और अब बलात्कार करने पर मौत की सजा भी मिल सकती है। उसे न तो इस नये कानून से डर लगा, न ही हत्या करने से, जिसमें डेढ़ सौ साल से ही सजा के रूप में मौत का प्रावधान है। उत्तर प्रदेश और बिहार में अपराधियों की पौधशाला इसलिए बन रही है क्योंकि पुलिस को अपराध छिपाने का अभ्यास है जिसे नीचे एस पी से लेकर मुख्यमंत्री प्रोत्साहित करता है और अगर अपराध लिख भी लिया तो अनुसंधान इतना लचर कर देगी (भ्रष्टाचार के कारण या गलत व्यक्ति को आरोपी बना कर) कि अपराधी बच निकलेगा। अदालतों का रवैया भी क्रिकेट के अम्पायर की तरह होता है न कि सत्य की तह तक पहुंचने की ललक। और निचले स्तर पर भ्रष्टाचार का बोल-बाला है।
जऱा गौर कीजिये। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार बिहार में सजा की दर मात्र 8.7 प्रतिशत है जबकी केरल में 77.8 प्रतिशत। इसका मतलब यह कि अगर उत्तर प्रदेश या बिहार में अगर पुलिस ने अपराध लिख भी लिया तो इस बात की गारंटी नहीं कि अनुसंधान की गुणवत्ता इतनी अच्छी होगी कि अदलतें आरोपी को सजा देगी।
कुछ आंकड़े देखें। बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों का दावा है कि इन राज्यों में आबादी के प्रतिशत के रूप में अपराध कम है। गहराई से छानबीन करें तो यह इसलिए है कि अपराध लिखे हीं नहीं जाते। जिन धाराओं में अपराध लिखना मज़बूरी है उनमें बिहार सबसे ऊपर है जैसे हत्या। अब नीतीश सरकार मंच से चिल्लाकर ऐलान कर सकती है कि अपराध के संज्ञेय मामलों में मध्य प्रदेश हीं नहीं केरल से भी कम है अर्थात 174 संज्ञेय अपराध प्रति एक लाख आबादी जब कि मध्य प्रदेश में यह 358.5 यानी दूना है। महिलाओं की इज्ज़त लूटने की घटनाएं भी बिहार में मात्र 574 हैं जबकि मध्य प्रदेश में 9618, राजस्थान में 6015 और केरल में (जो बिहार की आबादी का एक तिहाई है) 4412। तो क्या मान लिया जाये कि बिहार में महिलाओं का सम्मान केरल से अधिक है? नहीं, इस तरह के मामले लिखे नहीं जाते क्योंकि अगर महिलाओं का सम्मान रहता तो दहेज़ के लिए महिलाओं की हत्या के मामले में बिहार इन राज्यों से बेहद ज्यादा है। इसका कारण है कि दहेज़ के लिए हत्या में शव होता है और शव है तो छिपाना या न लिखना संभव नहीं।
अब इसका दूसरा पहलू देखें। अदालतें अपने काम के प्रति संजीदा नहीं है, न ही देश की अपराध न्याय प्रक्रिया अपनी जगह दुरुस्त है। निचली (मजिस्ट्रेट स्तर की) अदालतों में संवेदना की कमी है। और हाईकोर्ट अपने को ‘अब डर काहे का’ के भाव में रहता है क्योंकि उनकी हटाने की प्रक्रिया बेहद दुरूह है , बल्कि व्यव्हारिक तौर पर नामुमकिन है। उसको इसकी भी परवाह नहीं कि फैसले गलत होंगे तो सुप्रीम कोर्ट उनका कुछ भी बिगाड़ सकेगा। नतीज़तन उसी तर्क के आधार और साक्ष्य पर सेशंस कोर्ट सलमान को सजा दे देता है लेकिन हाईकोर्ट बरी कर देता है बगैर यह देखे कि फुटपाथ पर सोने वाले उन पांच लोगों का गुनाह क्या था कि दारू पीये फिल्म एक्टर की ‘पुरुषत्व प्रदर्शन’ का सिला एक की जान से और छार के घायल होने से मिलता है। हाईकोर्ट का फैसला आता है ‘अभियोजन सलमान के गाड़ी चलने के पुख्ता सबूत लेन में विफल रहा’। राजस्थान के हाईकोर्ट ने भी यह नहीं देखा कि चिंकारा अदालत में गवाही नहीं दे सकता वर्ना वह चीख-चीख कर क्या कहता। सेशन कोर्ट की सजा वहाँ से भी ख़ारिज। गहराई से देखें तो पता चलेगा कि सेशंस कोर्ट का जज फैसले में ज्यादा संजीदा होता है क्योंकि उसे डर रहता है कि गलत फैसला हुआ तो ऊपर हाईकोर्ट है जो कई तरह से (प्रशासनिक और सेवा संबंधित) प्रताडऩा दे सकता है। लेकिन हाईकोर्ट को इस तरह की प्रताडऩा की प्रक्रिया अभी तक व्यावहारिक रूप में नहीं शुरू की जा सकी है।
वाराणसी का उपरोक्त मामला यह बताता है कि सजा न तो अपराधी को हतोत्साहित करती है ना हीं उसे बेहतर आदमी बनाती है। तो फिर क्या ये पुलिस, क्या ये सरकार बनाम ….., कोई हाजिऱ है की बांग देता अंग्रेजों के ज़माने का झाबा पहने कोर्ट का नाजिऱ और क्यों काले कोट में वकीलों की फौज और वैसे ही काले कोट में जज साहबान और किस काम की न्याय की तराजू पकड़े अंधे आंख वाली न्याय की देवी!
(लेखक ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के जनरल सेके्रेटरी हैं)

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