संसद में बहस ‘असहिष्णुता’ नहीं ‘महंगी दाल’ पर हो

प्रवीण कुमार
विविध वैचारिक रंगों से भरे देश भारत में असहिष्णुता की कोई गुंजाइश नहीं है। यही हमारे संविधान की मूल भावना है और देश के अधिकांश लोगों का भी यही विचार है। मेरे विचार में तो यह महज सियासी मुद्दा है और जब-जब सियासी दलों को खुद के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगता है, इसे मुद्दा बनाकर सरकार को बदनाम करने की साजिश रची जाती है। इसमें दुर्भाग्यपूर्ण बात यह होती है कि असहिष्णुता के शोर में महंगी दाल की आवाज किसी को सुनाई नहीं देती।
संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो चुका है। अगर वाकई इस देश में जनतंत्र (जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा) है तो संसद को महंगी दाल सस्ती करने की तरकीब पर बहस करनी चाहिए ना कि असहिष्णुता के मुद्दे पर। महंगी दाल जहां सवा सौ करोड़ देशवासियों की दाल-रोटी और सेहत से जुड़ा मसला है, वहीं असहिष्णुता का मुद्दा चंद सियासी दलों को अपनी राजनीति चमकाने का जरिया।
दाल-रोटी से गुजारा करने वाले गरीबों की बात छोडि़ए, मध्यमवर्गीय, उच्च मध्यमवर्गीय घरों में भी अब दाल नहीं गल पा रही। सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद दाल की कीमत आसमान से नीचे उतरने को राजी नहीं। खुदरा बाजार में अरहर दाल की कीमत 175 से 200 रुपये प्रति किग्रा के बीच है। यानी पिछले एक साल में अरहर दाल की कीमत में करीब 135 प्रतिशत से भी अधिक का इजाफा हुआ है। खास बात यह कि दाल की यह कीमत तब आसमान छू रही है जब आने वाले साल 2016 को संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष (इंटरनेशनल पल्सेज ईयर) घोषित किया है।
एक अनुमान के मुताबिक, महंगी दाल का ट्रेंड काफी लंबे समय तक बना रह सकता है। खराब मॉनसून से खरीफ दलहन के उत्पादन में गिरावट आने का अनुमान है। बाजार के जानकार बताते हैं कि दाल की कीमतों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण जमाखोरी और कालाबाजारी है। बहुत हद तक सरकार की गलत नीतियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। मसलन, कीमतों पर काबू पाने के लिए सरकार ने आनन-फानन में दाल का आयात बढ़ा दिया। अब आप ये सोच लें कि आयात बढ़ाने से दाल की कीमतों में गिरावट आ जाएगी तो ये गलत होगा। उल्टा नई फसल आने पर किसानों को इसका खामियाजा भुगतना होगा। कहने का मतलब यह कि सरकार को दाल की कीमतें नियंत्रित करने के लिए कुछ तात्कालिक और कुछ चरणबद्ध नीति के तहत कदम उठाने होंगे।
तात्कालिक कदम उठाने के तहत बाजार में बिचौलिया तंत्र पर नकेल कसना सबसे जरूरी होगा। यह एक ऐसा तंत्र है जो सदियों से चली आ रही है और इसकी पहुंच सडक़ से लेकर संसद तक होती है। कोई भी इस तंत्र को छेडऩे से पहले 10 बार सोचता है कि इसपर कोई कार्रवाई की जाए या नहीं या फिर कितनी कार्रवाई की जाए ताकि दोनों पक्षों को कोई नुकसान ना हो।
तय मानिए ऐसे में तो महंगी दाल हो या फिर प्याज, आलू, टमाटर जो आम आदमी से जुड़ी तमाम उपभोक्ता वस्तुओं की कालाबाजारी पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है। यह विशुद्ध रूप से सरकार की ठोस व जन-कल्याणकारी नीति का हिस्सा है और संसद में बैठकर कानून बनाने वाले माननीय ही इस बारे में कुछ कर सकते हैं। एक ऐसे सख्त कानून की सख्त जरूरत है जो बिचौलिया तंत्र को खत्म कर सके। जाहिर है यह काम संसद ही कर सकती है, लेकिन दुख की बात यह कि संसद में बैठे सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्ष, उसके लिए सहिष्णुता और असहिष्णुता पर बहस महंगी दाल पर बहस करने से ज्यादा हितसाधक लगता है।
जहां तक दाल या अन्य खाद्य पदार्थों के कम उत्पादन की बात है तो इसके लिए सरकार को अपनी कृषि नीति में सुधार व संशोधन करने होंगे जिसका कुछ समय बाद असर दिखेगा। मसलन, फसली उत्पादन बढ़ाने के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर जोर, दलहन बुआई का रकबा बढ़ाने के प्रयास, किसानों को फसल उत्पादन के लिए आर्थिक व तकनीकी मदद जैसे प्रावधान को लागू करने होंगे। यह भी जरूरी है कि किसानों से सरकार बाजार भाव पर दाल खरीदे और चावल-गेहूं की तरह दाल का बफर स्टॉक बने।
संसद में बैठेने वाले नीति निर्माताओं के लिए यह जानना जरूरी होगा कि हमारा देश सिर्फ दाल का सबसे बड़ा उत्पादक ही नहीं है, खपत और आयात के मामले में भी दनिया में अव्वल है। दुनिया में दाल की कीमत तीन गुना बढक़र 2000 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच गया है। साठ के दशक में देश में जहां प्रति व्यक्ति 70 ग्राम दाल प्रतिदिन खपत होती थी वहीं अब यह आधे से भी कम करीब 30 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन हो गई है। ऐसे में संसद के लिए यह तय करना अहम होगा कि शीतकालीन सत्र में बहस का मुद्दा असहिष्णुता बने या फिर देश में सबके हिस्से प्रतिदिन 50 ग्राम दाल की पहुंच कैसे हो।

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