संसदीय सचिव मामले में कानून पर भारी सियासत

“दिल्ली में मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव के पद को 2006 के कानून द्वारा ‘लाभ के पद’ के दायरे से बाहर किया गया परंतु मंत्रियों के संसदीय सचिव ‘लाभ के पद’ के दायरे में ही बने रहे। संविधान के अनुच्छेद-239क के अनुसार अधिकतम 6 मंत्री बनाने के एक महीने बाद ही केजरीवाल को दबाव की वजह से 21 विधायकों को संसदीय सचिव पद पर नियुक्त करना पड़ा, जिसमें कानून की अनदेखी हुई।”
विराग गुप्ता
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली की ‘आप’ सरकार द्वारा 21 विधायकों की संसदीय सचिव पद पर नियुक्ति में कानूनी विवाद से देश के अन्य राज्यों में इन पदों के औचित्य पर बहस छिड़ गई है।
सांसदों और विधायकों को वेतन भत्ते के अलावा संसदीय विशेषाधिकार भी मिलता है। विधायिका में कानून निर्माण के दौरान इन लोगों की तटस्थता और निष्पक्षता रहे इसलिए संविधान के अनुच्छेद 102 तथा 191 में यह प्रावधान किया गया कि सांसद और विधायक अन्य ‘लाभ का पद’ नहीं ले सकते। दिल्ली में मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव के पद को 2006 के कानून द्वारा ‘लाभ के पद’ के दायरे से बाहर किया गया परंतु मंत्रियों के संसदीय सचिव ‘लाभ के पद’ के दायरे में ही बने रहे। संविधान के अनुच्छेद-239क के अनुसार अधिकतम 6 मंत्री बनाने के एक महीने बाद ही केजरीवाल को दबाव की वजह से 21 विधायकों को संसदीय सचिव पद पर नियुक्त करना पड़ा, जिसमें कानून की अनदेखी हुई।
दिल्ली सरकार द्वारा मार्च 2015 में जारी अधिसूचना के अनुसार संसदीय सचिवों को कोई अतिरिक्त वेतन या भत्ता नहीं मिलेगा, जैसा कि अन्य राज्यों में होता है। विधायकों द्वारा चुनाव आयोग को दिए गए जवाब में यह कहा गया है कि उन्हें कोई लाभ, पूर्णकालिक कार, ड्राइवर नहीं मिलता और वे सरकारी कार्यों में कोई हस्तक्षेप भी नहीं कर सकते हैं। परंतु आरटीआई से यह साबित होता है कि इन संसदीय सचिवों को मंत्रालय में कमरा, सरकारी टेलीफोन, इंटरनेट एवं सामूहिक कार इत्यादि की सुविधा मिलती है। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि जब कोई कानूनी अधिकार या सुविधाएं नहीं हैं तो फिर इन पदों पर नियुक्ति क्यों हुई और अगर उन्हें लाभ नहीं मिल रहा था तो 3 महीने बाद संरक्षण हेतु कानून क्यों बनाया गया?
संसदीय सचिवों की नियुक्ति को दिल्ली हाईकोर्ट में जब चुनौती मिली तब आनन-फानन में मंत्रियों के संसदीय सचिवों को लाभ के पद के दायरे से बाहर करने के लिए दिल्ली विधानसभा द्वारा 24 जून 2015 को कानून पारित कर दिया गया जिसे राष्ट्रपति ने मंजूरी देने इनकार कर दिया है। जया बच्चन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि लाभ लेना आवश्यक नहीं है और यदि ‘लाभ का पद’ लिया गया है तो वह अयोग्यता का पर्याप्त आधार है जिससे दिल्ली के 21 संसदीय सचिवों पर भी अयोग्यता की तलवार लटक रही है। चुनाव आयोग की रिपोर्ट के आधार पर एनसीटी अधिनियम 1991 की धारा 15 के तहत इस बारे में आखिरी फैसला राष्टï्रपति को करना है जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
केजरीवाल यह दलील देकर भी अपने विधायकों को बचा सकते हैं कि उनकी संसदीय सचिव पद पर वैध नियुक्ति कभी हुई ही नहीं क्योंकि उसे उपराज्यपाल की मंजूरी नहीं मिली थी। पर इस कानूनी बचाव से उन्हें उपराज्यपाल की सर्वोच्चता के साथ अपनी गलती को स्वीकारना होगा जो राजनीतिक तौर पर उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है इसीलिए अन्य राज्यों में संसदीय सचिव पद के दुरुपयोग के मामलों को दिखाकर, केजरीवाल इस लड़ाई को राजनीति के अखाड़े में लडऩा चाह रहे हैं।
केजरीवाल ने पूर्ववर्ती कांग्रेस तथा भाजपा सरकारों द्वारा दिल्ली में संसदीय सचिव की परंपरा का ब्यौरा देते हुए अन्य राज्यों में बड़े पैमाने पर इन पदों की नियुक्ति पर सवाल खड़े किए हैं। भाजपा शासित हरियाणा और गुजरात में 4, राजस्थान में 5, अरुणाचल प्रदेश में 19 संसदीय सचिवों की नियुक्ति का ब्यौरा आया है जिनमें से अधिकांश को राज्यमंत्री का दर्जा तथा वेतन भी मिलता है। परंतु इन राज्यों ने संसदीय सचिव को लाभ के पद से बाहर रखने के लिए कानून पारित किए हैं जो दिल्ली में नियुक्ति के पहले नहीं हुआ।
दिल्ली के मामलों में राष्टï्रपति कोई भी फैसला गृह मंत्रालय और केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर करते हैं। अन्य राज्यों में संसदीय सचिवों पर कार्रवाई किए बगैर यदि दिल्ली के विधायकों को अयोग्य घोषित किया जाता है तो केजरीवाल उसका राजनीतिक लाभ पंजाब तथा गोवा के चुनावों में ले सकते हैं। इन राजनीतिक समीकरणों में उलझा संसदीय सचिव विवाद क्या अपने कानूनी अंजाम तक पहुंच पाएगा, आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा..।

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