शीतकालीन सत्र चलाने की चुनौती

भले ही केन्द्र सरकार असहिष्णुता पर संसद में बहस करने को तैयार है लेकिन यह देखना रोचक होगा कि कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक पार्टियां बहस करती हैं या संसद का कार्य बाधित करती हैं। शीतकालीन सत्र में केन्द्र सरकार की कोशिश होगी कि वह इस सत्र में कम से कम जीएसटी और भूमि अधिग्रहण बिल पास करा ले।

sanjay sharma editor5संसद का मानसून सत्र तो हंगामें की भेंट चढ़ गया था। जनहित में कोई कार्यवाही नहीं हुई थी। मानसून सत्र में जो दृश्य दिखा था वह यदा-कदा ही देखने को मिलता है। अब, जब शीतकालीन सत्र शुरू हो रहा है तो सरकार के सामने एक बार फिर चुनौती है। पिछली बार की तरह इस बार भी विपक्षी पार्टियों के पास अनेक मुद्दे हैं जिस पर वह संसद का कार्य बाधित करने की कोशिश करेंगी। केन्द्र सरकार वैसे भी पिछले दो महीने से विपक्षी पार्टियों के निशाने पर है। इस समय देश में असहिष्णुता का मुद्दा गरम है। इसके अलावा भी कई मुद्दे हैं जिस पर विपक्षी केन्द्र सरकार को घेरने का प्रयास करेंगे। पिछले मानसून सत्र में संसद के दोनों सदनों के 119 घंटे की कार्यवाही ललित गेट और व्यापमं पर हुए हंगामे की भेंट चढ़ गई। इसके साथ ही 1.78 अरब रुपये भी स्वाहा हो गए। कितने महत्वपूर्ण बिल पर चर्चा तक नहीं हो पायी। अब मानसून सत्र पर विपक्षी पार्टियों की निगाह है।
भले ही केन्द्र सरकार असहिष्णुता पर संसद में बहस करने को तैयार है लेकिन यह देखना रोचक होगा कि कांग्रेस सहित अन्य राजनैतिक पार्टियां बहस करती हैं या संसद का कार्य बाधित करती हैं। शीतकालीन सत्र में केन्द्र सरकार की कोशिश होगी कि वह इस सत्र में कम से कम जीएसटी और भूमि अधिग्रहण बिल पास करा ले। लेकिन वर्तमान में विपक्षी पार्टियों का रवैया देखके नहीं लगता कि शीतकालीन सत्र अच्छे से चलने देंगी। अनेक मुद्दों से घिरी केंद्र सरकार की स्थिति इस बार भी असहज ही है।
यह तो अब परंपरा में आ गया है कि जो पार्टी विपक्ष में होती है वह संसद की कार्यवाही के दौरान सरकार को घेरने की कोशिश करती है। जब यूपीए का शासन था तो भाजपा ने भी संसद को कई बार चलने से रोका था। अब जबकि मानसून सत्र शुरू हो गया है तो विपक्षी पार्टियों को संसद की गरिमा का ध्यान रखते हुए संसद की कार्यवाही में खलल नहीं डालना चाहिए। दरअसल संसद की कार्यवाही के दौरान पूरी दुनिया की निगाह भारत पर टकी होती है। संसद देश का मंदिर है और प्रत्येक मिनट का खर्चा लाखों में आता है। करोड़ों-अरबों रुपये बहसबाजी में बर्बाद करना कहीं से उचित नहीं है। जनता की गाढ़ी कमाई का उपयोग जनता के लिए ही होना चाहिए। इसलिए कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक पार्टियों को संसद में जनहित के मुद्दों पर बहस कर जरूरी बिल पास करने में सहयोग करना चाहिए।

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