शिक्षा जगत की बदलती तस्वीर और सत्यतायें

हम भारी हृदय से गुरुकुलों की शिक्षण पद्धति को अलविदा कहने के लिए मजबूर हैं। आज के छात्र को एक अच्छा पुर्जा या चलतापुर्जा बनना जरूरी है। उसे स्टेनोग्राफी, दर्जीगिरी, लेखा संधारण, मोटर मैकेनिकल या प्रबंधन आता हो, वह अच्छा नल मिस्त्री, बिजली मिस्त्री या फिटर हो, तो उसके लिए देश और विदेशों में भी नौकरियां ही नौकरियां हंै। यही आज की पुकार है।

इंदिरा मिश्र
शिक्षा का भारत में पारम्परिक अर्थ है, व्यक्ति को शास्त्रों में सुशिक्षित करना उसे अच्छे जीवन मूल्य देना, उसे सुसंस्कृत और सभ्य बनाना, उसमें घर-परिवार और समाज के प्रति सही दृष्टिकोण विकसित करना। उसे ज्ञानवान बनाना।
आज की शिक्षा में उपरोक्त सभी बातें आती हैं, किन्तु इनके अलावा एक महत्वपूर्ण बात का भी समावेश रहता है, कि शिक्षित हो जाने के बाद व्यक्ति अपनी आजीविका भी भली-भांति कमा सके। बल्कि आज माता-पिता और बालक स्वयं इस बात के लिए काफी जागरूक रहते हैं कि शिक्षा पूरी होने के बाद वह छात्र आगे कौन से व्यवसाय में जायेगा। सबको अपने क्षेत्र में चयन की स्वतंत्रता होती है। शिक्षा के अधिकार संबंध मौलिक अधिकार मिलने के बाद माता-पिता पर भी यह दबाव बन जाता है, कि वे अपने बालक को कम से कम 6 से 14 वर्ष की आयु तक तो अवश्य ही शिक्षित करेंगे। उम्र के 14 वर्ष, अथवा आठवीं कक्षा पास करने के उपरान्त छात्र चयन कर सकता है कि आगे उसे क्या करना है। यदि वह जल्दी चयन कर लेता है, तो इसका यह फायदा होता है कि वह अपने चयनित क्षेत्र में ही तेजी से तरक्की करके कुशल बन सकता है। बल्कि आज की यह एक तीक्ष्ण आवश्यकता बन गई है।
आजादी से पहले भारत एक कृषि प्रधान देश था। परन्तु धीरे-धीरे वह औद्योगीकरण की ओर बढ़ता रहा। आज स्थिति यह है कि देश की लगभग 50 प्रतिशत जनता कृषि में अथवा कृषि से जुड़े कार्यों में आजीविका के लिए संलग्न है, जबकि कृषि का देश के सकल उत्पाद में योगदान घट कर कुल 13 प्रतिशत रह गया है। इससे स्पष्ट ही यह विदित होता है कि लोगों को कृषि से पर्याप्त आय प्राप्त नहीं हो रही। वैसे भी आज शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है, अत: लोगों को शहरों की ओर जाना होगा। शहरों में आजीविका के साधनों को पाने के लिए उन्हें उनके लायक अर्हताएं प्राप्त करनी होंगी।
वर्ष 2008 से विश्व मंदी के दौर से गुजर रहा है, भारत के लिए इसका अर्थ यह रहा है कि यहां शासन में कोई आए पद सृजित नहीं होंगे, सार्वजनिक उपक्रमों में भी कम पदों से काम चलाया जायेगा, यथासंभव सार्वजनिक उपक्रमों का विनियोजन होगा। हर उपक्रम को अपने आय के साधन बढ़ाने होंगे, लोगों के कल्याणकारी कार्यों में कमी आएगी और छात्र वर्ग को व्यवसायिक, शिक्षा तथा कार्यकौशल अधिक दिलाया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्र में भी नीति बदली। यद्यपि वैश्विक मन्दी का हम पर उतना प्रभाव नहीं पड़ा, जितना अमेरिका व कुछ अन्य देशों पर पड़ा था। फिर भी, सरकारी पदों में भर्ती पर रोक लगी और बेरोजगारी बढ़ी। आज छग में ही 12 लाख बेरोजगार व्यक्ति रोजगार हेतु अकेले छत्तीसगढ़ में पंजीकृत हैं। अमेरिका में भी यह विश्लेषण किए जाते रहे, कि भले ही कितनी भी मन्दी हो, कुछ क्षेत्रों में मनुष्य मात्र के जीवन और आधार भूत गतिविधियों के चलते सबके लिए तो रोजगार के अवसर आते ही रहेंगे जैसे कि-
1. रेस्तोरां भोज्य पदार्थ व होटल तथा हॉस्पिटीलिटी उद्योग 2. स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं, औषधि निर्माण, विक्रय, 3. यातायात सुविधायें 4. परिधान व फैशन 5. सूचना प्रौद्योगिकी 6. बैंकिंग सेवायें 7. जीवन बीमा तथा अन्य इन्श्योरेंस 8. शिक्षा सामान्य व व्यावसायिक 9. सेना, पुलिस, अन्य सुरक्षा के उपाय, भवन निर्माण, विद्युत कार्य 10. मनोरंजन।
इस सूची से स्वयं स्पष्ट हो जाता है कि रोजगार पाने के लिए किसी युवा को किन क्षेत्रों में कौशल प्राप्त होना चाहिये। हम भारी हृदय से गुरुकुलों की शिक्षण पद्धति को अलविदा कहने के लिए मजबूर हैं। आज के छात्र को एक अच्छा पुर्जा या चलतापुर्जा बनना जरूरी है। उसे स्टेनोग्राफी, दर्जीगिरी, लेखा संधारण, मोटर मैकेनिकल या प्रबंधन आता हो, वह अच्छा नल मिस्त्री, बिजली मिस्त्री या फिटर हो, तो उसके लिए देश और विदेशों में भी नौकरियां ही नौकरियां हंै। यही आज की पुकार है।

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