शहर से पहले आप तो स्मार्ट हो जाइये

जैसे एक कंपनी ने दिखाया कि अब शहर में गली-गली में घूमकर कचरा उठाने की ज़रूरत नहीं है। आप अपने अपार्टमेंट से कचरा फेंकिये, घर के बाहर लगे कचरे के बक्से में डालिए, वहां से आपके कचरे का पैकेट तीन से दस किलोमीटर लंबी पाइप के जरिये सत्तर किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से एक केंद्रीय सिस्टम में पहुंचेगा। पाइप के अंतिम छोर पर खड़े ट्रक में कचरे का पैकेट अपने-आप भरता जाएगा।
रवीश कुमार

प्रगति मैदान में स्मार्ट सिटी पर एक मेला लगा है। बड़ी-बड़ी कंपनियां आज की शहरी जि़न्दगी के समाधान लेकर हाजिऱ हैं। ये वे समाधान हैं, जो बहुत पहले से मार्केट में हैं। कुछ नए भी हैं। इनमें से कई समाधानों को दस-पंद्रह सालों से दुनिया से लेकर भारत में होटल से लेकर अपार्टमेंट में इस्तेमाल किया जा चुका है। प्रगति मैदान में सब अपने-अपने स्टॉल लेकर स्मार्ट सिटी के विचार और सामान की ज़रूरत को पूरा कर रहे हैं, लेकिन अब इन्हें स्मार्ट सिटी के नाम पर एक जगह लाया जा रहा है, पैकेजिंग की जा रही है।
जैसे एक कंपनी ने दिखाया कि अब शहर में गली-गली में घूमकर कचरा उठाने की ज़रूरत नहीं है। आप अपने अपार्टमेंट से कचरा फेंकिए, घर के बाहर लगे कचरे के बक्से में डालिए, वहां से आपके कचरे का पैकेट तीन से दस किलोमीटर लंबी पाइप के जरिये सत्तर किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से एक केंद्रीय सिस्टम में पहुंचेगा। पाइप के अंतिम छोर पर खड़े ट्रक में कचरे का पैकेट अपने-आप भरता जाएगा। ट्रक इस कचरे को लेकर उस जगह जाएगा, जहां हर कचरे की छंटाई होगी और उनका फिर से इस्तेमाल किया जाएगा। गुजरात में बन रहे स्मार्ट सिटी गिफ्ट में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन मुंबई में एक रीयल एस्टेट कंपनी ने भी अपने 400 फ्लैटों के लिए यह व्यवस्था लगाई है। लेकिन स्मार्ट सिटी के तहत ये सारी तकनीकें एक जगह बेची जाएंगी, फिट की जाएंगी। इस तकनीक को लगाना एक तरह से अनिवार्य कर दिया जाएगा, तभी तो स्मार्ट सिटी कहलाएगा।
एक मोहतरमा मुझे अपने स्टॉल पर ले गईं। वहां मुझे बताया गया कि वे कई वर्षों से होटलों में अपनी तकनीक सप्लाई कर रहे हैं। आपने कई होटलों में देखा होगा कि स्विच बदल रहे हैं। इनके अनुसार आप होटल में प्रवेश करेंगे और आप उस होटल का ऐप डाउनलोड करेंगे। डाउनलोड करने के बाद आप अपने फोन से बिस्तर पर बैठे-बैठे पर्दे को खोल सकेंगे और बंद कर सकेंगे। बिस्तर से उठकर बांहें फैलाकर पर्दा हटाना नहीं पड़ेगा। इसी तरह आप आई-पैड या किसी भी स्मार्ट फोन से बत्ती बंद कर सकते हैं, टीवी ऑन कर सकते हैं और विदेश में बैठे-बैठे अपनी बुज़ुर्ग माताजी को उठाए बिना किसी के लिए दरवाज़ा खोल सकते हैं। आप अपने मोबाइल फोन पर घर में क्या हो रहा है, यह सब देख सकते हैं। दलील यह दी गई कि अब जि़न्दगी बदल गई है। घर में माता-पिता और बच्चा विदेश में, लेकिन इस ऐप्लिकेशन से आप घर पर नजऱ रख सकते हैं। मोहतरमा ने मुझे कॉफी की पेशकश करते हुए कहा कि हमारा नारा भी यही है कि एक कप कॉफी बनाने जितना आसान है हमारा समाधान। मैंने बस पूछ लिया कि एक कमरे के लिए इस ऐप्लिकेशन को लगाने में कितना खर्चा आएगा, तो हंसकर बोलीं, बस डेढ़ लाख रुपये। मैंने कहा, तब तो कॉफी आपकी वाकई बेहद सस्ती है। डेढ़ लाख की एक कॉफी पी जा सकती है। पर आपको यह समझना है कि यह समाधान जितना भी आकर्षक लगे, क्या यह औसत मध्यम वर्गीय नागरिक के लिए है। गरीब को तो छोड़ ही दीजिए।
तकनीक का हमारी जिन्दगी में प्रवेश हो रहा है, उसे रोका नहीं जा सकता है। हमारे ही देश में अलग-अलग सरकारें इन तकनीकी समाधानों का इस्तेमाल कर रही हैं, बस, इन्हें एक नए नाम से पुकारा जाने लगा है – स्मार्ट सिटी। वैसे स्मार्ट सिटी में सामान्य नागरिक के क्या अधिकार होंगे, यह अभी साफ नहीं है। जैसे ग्रेटर नोएडा में किसी रीयल एस्टेट कंपनी को गोल्फ सिटी या स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर ज़मीन दी जाती है। वह हाई-टेक तो होगा ही, लेकिन क्या हर कोई उस गोल्फ सिटी में जा सकता है। यहीं हमें अपनी प्राथमिकता समझने की ज़रूरत है।

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