विपक्ष के हमलों से बचने के लिए सादगी से जन्मदिन मनाएंगी माया

जन्मदिन पर उनकी उम्र के बराबर के वजन का नहीं कटेगा केक
पार्टी मुख्यालय और सूबे के अन्य पार्टी कार्यालयों पर समारोह आयोजित करने पर लगाई रोक

captureसुनील शर्मा
लखनऊ। नोटबंदी का सबसे अधिक असर बहुजन समाज पार्टी पर दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद से लगातार नोटबंदी पर बसपा सुप्रीमो मायावती के बयानों में इसकी झलक दिख जाती है। इसलिए पार्टी के कार्यक्रम सीमित व छोटे कर दिए गए हैं। मायावती ने अपना 61वां जन्मदिन भी सादगी से मनाने का निर्णय लिया है। इस बार उनके जन्मदिन पर न तो उनकी उम्र के बराबर वजन का केक कटेगा और न ही पार्टी कार्यालयों में समारोह आयोजित होंगे। पार्टी मुखिया उपहार भी नहीं लेंगी। ऐसा बड़े नोट बंद होने के बाद किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पूर्व पार्टी विरोधियों को आलोचना का कोई भी मुद्दा नहीं देना चाहती हैं।
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती अपना जन्मदिन (15 जनवरी) बड़े ही घूमधाम से मनाती आ रही हैं। इस दिन उनके समर्र्थक भव्य समारोह आयोजित करते हैं। उनकी उम्र के मुताबिक केक का वजन निर्धारित कर बनवाया जाता है। उनके समर्थक लाखों करोड़ों रुपए उपहार के नाम पर देते हैं। जिसको लेकर मायावती हमेशा विवादों में घिरी रहती हैं। एक बार अपने जन्मदिन पर समर्थकों से पांच करोड़ रुपए की माला पहनकर वे विरोधियों के निशाने पर आ गईं थीं। उनकी मीडिया में भी काफी फजीहत हुई थी। इसलिए अबकी बार मोदी सरकार की नोटबंदी और किसी भी तरह की आलोचना से बचने के लिए अपना जन्मदिन सादगी से मनायेंगी।
पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक मायावती ने सार्वजनिक रूप से उपहार न देने के लिए भी समर्थकों से अनुरोध किया है। इसके पीछे नोटबंदी को प्रमुख कारण बताया गया है। वहीं राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मायावती ने यह फैसला आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर किसी भी विवाद से बचने के लिए किया है। उनका मानना है कि अगर नोटबंदी के दौर में मायावती अपना जन्मदिन आलीशान तरीके से मनाकर पूर्व की भांति उपहार लेंगी तो वे इससे विरोधियों के निशाने पर आ सकती हैं। अभी कुछ दिन पूर्व नोटबंदी के बाद दिल्ली की एक बैंक में बसपा व मायावती के भाई आनंद के खाते में करीब 104 करोड़ रुपये जमा होने की खबर पर विरोधी दलों ने खूब हो हल्ला मचाया था। इस मामले में अभी भी उनको घेरने में विपक्षी दल जुटे हैं। वहीं मायावती पर पार्टी का टिकट देने की एवज में उम्मीदवारों से करोड़ों रुपए लेने के आरोप भी लगते रहे हैं। इतना ही नहीं नोटबंदी के फैसले पर मायावती की तिलमिलाहट को भी इससे जोड़ा जाता रहा है। इस बात की पुष्टिï बसपा में लंबे समय तक मायावती के करीबी रहे नेताओं ने अन्य दलों में शामिल होने के दौरान की थी।

कार्यक्रमों को भी करना पड़ा सीमित
प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी के फैसले को लेकर पूरा विपक्ष लामबंद है, जिसमें बसपा प्रमुख मायावती सबसे अधिक मुखर हैं। नोटबंदी के बाद से ही वे लगातार प्रधानमंत्री मोदी पर हमलावर हैं। उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के नजदीक किया गया मोदी का यह फैसला उन्हें रास नहीं आया है। नोटबंदी के चलते उन्हें अपने तमाम बड़े कार्यक्रमों को सीमित करना पड़ा है। इसके चलते उन्हें डॉ. अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर आयोजित होने वाली विशाल रैली को छोटी बैठक व कार्यक्रम में तब्दील करना पड़ा था, जबकि पार्टी इसके बहाने एक बार फिर शक्ति प्रदर्शन करने की तैयारी में थी। वहीं पार्टी ने बड़ी जनसभाओं से तौबा कर ली है। प्रदेश में छोटी-छोटी बैठकें करने का निर्णय लिया गया है।

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